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राजस्थान की पंचायत राजनीति से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। अब राज्य में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए 'दो से अधिक संतान' होने के आधार पर किसी भी व्यक्ति को अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा। लगभग तीन दशक से लागू यह प्रावधान अब समाप्त कर दिया गया है।
राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 13 जुलाई 2026 को जारी पत्र में सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को जानकारी दी गई है कि 25 मार्च 2026 की राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम, 1994 की धारा 19 में संशोधन किया गया है। इस संशोधन के बाद पंचायत चुनावों के लिए संतान संबंधी अयोग्यता का प्रावधान हटा दिया गया है।
अब जानते हैं कि पहले नियम क्या था।
करीब 30 साल पहले राजस्थान में यह व्यवस्था लागू की गई थी कि यदि किसी व्यक्ति के दो से अधिक संतान हैं, तो वह ग्राम पंचायत, पंचायत समिति या जिला परिषद का चुनाव नहीं लड़ सकता था। इस नियम का उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देना बताया गया था।
लेकिन समय के साथ इस नियम पर लगातार बहस होती रही। कई जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों का कहना था कि यह प्रावधान लोकतांत्रिक भागीदारी को सीमित करता है और कई योग्य लोगों को चुनाव लड़ने से वंचित कर देता है।
इसी को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार ने वर्ष 2026 में पंचायतीराज अधिनियम में संशोधन किया और धारा 19 से दो से अधिक संतान के आधार पर अयोग्यता वाले प्रावधान को हटा दिया।
इस बदलाव के बाद अब पंचायत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की पात्रता उनके बच्चों की संख्या के आधार पर तय नहीं होगी। यानी यदि किसी व्यक्ति की दो से अधिक संतान हैं, तो केवल इसी वजह से उसे चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकेगा।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि पंचायत चुनावों से जुड़ी अन्य सभी पात्रता और अयोग्यता की शर्तें पहले की तरह लागू रहेंगी। यह संशोधन केवल दो से अधिक संतान वाले प्रावधान को हटाने से संबंधित है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस फैसले का असर आगामी पंचायत चुनावों में देखने को मिल सकता है। ऐसे कई संभावित उम्मीदवार, जो पहले इस नियम के कारण चुनाव नहीं लड़ सकते थे, अब चुनावी मैदान में उतर सकेंगे। इससे पंचायत चुनावों में मुकाबला और भी दिलचस्प होने की संभावना है।
तो कुल मिलाकर, राजस्थान में पंचायत चुनावों से पहले एक बड़ा बदलाव हुआ है। 25 मार्च 2026 की अधिसूचना और उसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशों के अनुसार अब 'दो से अधिक संतान' होना पंचायत चुनाव लड़ने में अयोग्यता का आधार नहीं रहेगा।
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शाहपुरा की चर्चित चरागाह भूमि और देव गौशाला प्रकरण में अब बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। जिस मामले को लेकर पिछले कई दिनों से अखबारों में लगातार खुलासे किए जा रहे थे, अब उसी मामले में विवादित स्थल से बिजली का कनेक्शन काट दिया गया है और मौके पर की गई तारबंदी भी हटाई जा रही है।
दरअसल, इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब दैनिक भास्कर और भीलवाड़ा नवज्योति सहित कई समाचार पत्रों ने दस्तावेजों के आधार पर खबरें प्रकाशित कीं। खबरों में दावा किया गया कि शाहपुरा की सरकारी चरागाह भूमि पर बिना अंतिम भूमि आवंटन के लगभग 5 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा कर तारबंदी, टीनशेड और बिजली कनेक्शन जैसी व्यवस्थाएं कर दी गईं।
समाचार पत्रों में प्रकाशित दस्तावेजों के अनुसार, जिस देव गौशाला सेवा संस्था के नाम भूमि आवंटन का प्रस्ताव था, उसमें उस समय शाहपुरा विधायक डॉ. लालाराम बैरवा सचिव थे। वहीं उनके पुत्र चिनार देवतवाल अध्यक्ष और दूसरे पुत्र जतिन देवतवाल कोषाध्यक्ष बताए गए। यही तथ्य इस पूरे विवाद का प्रमुख कारण बना।
इसके बाद जिला प्रशासन का एक पत्र भी सामने आया। इस पत्र में स्पष्ट उल्लेख था कि राजस्थान गौशाला भूमि आवंटन नियमों के अनुसार संस्था का विधिवत पंजीकरण और कम से कम तीन वर्षों से संचालन आवश्यक है। नियमों की पूर्ति नहीं होने के कारण उस समय भूमि आवंटन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकती थी।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि यदि भूमि का अंतिम आवंटन नहीं हुआ था, तो फिर विवादित स्थल पर तारबंदी, टीनशेड और बिजली कनेक्शन कैसे मिल गया? आखिर किसकी अनुमति से यह सब हुआ? यही सवाल अखबारों ने लगातार उठाए।
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खबरें प्रकाशित होने के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हुआ। लोगों ने दस्तावेज साझा किए और प्रशासन से कार्रवाई की मांग उठने लगी।
अब इस पूरे मामले में नया घटनाक्रम सामने आया है। जानकारी के अनुसार, जिस स्थान पर विवाद था, वहां बिजली का कनेक्शन काट दिया गया है। साथ ही मौके पर की गई तारबंदी भी हटाई जा रही है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि मामले में प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई शुरू हो चुकी है। हालांकि संबंधित विभाग की ओर से अभी तक इस कार्रवाई का विस्तृत आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है।
इसी बीच एक और महत्वपूर्ण दस्तावेज सामने आया, जिसमें डॉ. लालाराम बैरवा ने देव गौशाला सेवा संस्था के सचिव पद और सदस्यता से त्यागपत्र देने की जानकारी दी है। यह त्यागपत्र वर्ष 2025 का बताया जा रहा है।
वहीं इस पूरे मामले पर शाहपुरा विधायक डॉ. लालाराम बैरवा का पक्ष भी सामने आया है। विधायक बैरवा का कहना है कि गौशाला उन्होंने पूरी तरह गोवंश के हित और गौसेवा के उद्देश्य से बनाई थी। उनका कहना है कि वे काफी समय पहले ही संस्था के सचिव पद से इस्तीफा दे चुके हैं और वर्तमान में उनका या उनके किसी भी परिवारजन का संस्था में कोई पद नहीं है। विधायक ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी राजनीतिक छवि खराब करने के उद्देश्य से इस प्रकार की खबरें चलाई जा रही हैं और पूरे मामले को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
अब यदि पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो तीन महत्वपूर्ण सवाल सामने आते हैं।
पहला, यदि भूमि आवंटन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, तो बिजली कनेक्शन और निर्माण कार्य किस आधार पर हुए?
दूसरा, यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था, तो अब बिजली कनेक्शन काटने और तारबंदी हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
और तीसरा, यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
इन सभी सवालों के जवाब अब प्रशासनिक जांच और आधिकारिक रिपोर्ट आने के बाद ही पूरी तरह स्पष्ट हो पाएंगे।
फिलहाल तस्वीर यही बताती है कि एक ओर समाचार पत्रों में प्रकाशित दस्तावेजों के आधार पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, वहीं दूसरी ओर विधायक डॉ. लालाराम बैरवा इन आरोपों को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बता रहे हैं।
सच्चाई क्या है, इसका अंतिम फैसला जांच, प्रशासनिक रिकॉर्ड और आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही होगा।
इस पूरे मामले से जुड़ी हर बड़ी और प्रमाणित अपडेट हम आपको सबसे पहले पहुंचाते रहेंगे।
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नमस्कार, आप देख रहे हैं यक्ष न्यूज़।
राजस्थान की राजनीति और गांव-शहर की सरकारों से जुड़ी इस समय की सबसे बड़ी खबर सामने आई है। अगर आप पंचायत या नगर निकाय चुनाव का इंतजार कर रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि अब लगभग साफ हो गया है कि प्रदेश में 31 जुलाई तक पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव होना संभव नहीं है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायती राज विभाग को पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव करवाने के लिए कम से कम 90 दिन का समय लगेगा। यानी आरक्षण तय होने के बाद भी चुनाव तुरंत नहीं होंगे।
अब सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि हाईकोर्ट की तय समय-सीमा भी पूरी होती नजर नहीं आ रही?
इसके लिए हमें थोड़ा पीछे चलना होगा।
राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकायों का कार्यकाल समाप्त हुए काफी समय हो चुका है। चुनाव में लगातार देरी को लेकर मामला राजस्थान हाईकोर्ट पहुंचा। 22 मई 2026 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को स्पष्ट निर्देश दिए कि 31 जुलाई 2026 तक पूरी चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराई जाए। अदालत ने सरकार की अधिक समय मांगने की दलील भी स्वीकार नहीं की थी।
लेकिन अब सामने आई नई स्थिति ने पूरी तस्वीर बदल दी है।
निर्वाचन आयोग का कहना है कि चुनाव करवाने से पहले एससी, एसटी, ओबीसी और महिला वर्ग के लिए आरक्षण का अंतिम निर्धारण होना जरूरी है। बिना इस प्रक्रिया के चुनाव कराना कानूनी रूप से उचित नहीं होगा।
यहीं सबसे बड़ी अड़चन ओबीसी आरक्षण की रिपोर्ट बनी हुई है।
सरकार ने निर्वाचन आयोग को बताया है कि ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग अपनी रिपोर्ट 14 अगस्त तक सौंपेगा। इसके बाद सरकार 31 अगस्त तक सभी वर्गों का आरक्षण तय करेगी। यानी जुलाई में चुनाव कराने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है।
अब समझिए आयोग के बताए 90 दिनों का पूरा गणित।
निर्वाचन आयोग के अनुसार जैसे ही सरकार आरक्षण की अंतिम अधिसूचना जारी करेगी, उसके बाद चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जाएगा। इसके बाद मतदाता सूची, नामांकन, जांच, नाम वापसी, चुनाव चिन्ह आवंटन, मतदान दलों की नियुक्ति, सुरक्षा व्यवस्था, मतदान और मतगणना जैसी पूरी कानूनी प्रक्रिया में लगभग 90 दिन लगेंगे।
इनमें से करीब 50 दिन पंचायत चुनावों के लिए और 40 दिन नगरीय निकाय चुनावों के लिए निर्धारित किए गए हैं।
आयोग ने यह भी बताया है कि इस बार पंचायत चुनाव चार चरणों में और नगरीय निकाय चुनाव दो चरणों में कराए जाने की संभावना है। इसका कारण प्रदेश में बढ़ी पंचायतें, प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा बलों की उपलब्धता बताया गया है।
अब सबसे अहम सवाल...
क्या हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना होगी?
ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में आयोग ने साफ संकेत दिए हैं कि 31 जुलाई की समय-सीमा का पालन संभव नहीं दिख रहा। अब माना जा रहा है कि राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग हाईकोर्ट से अतिरिक्त समय मांग सकते हैं। अंतिम निर्णय अदालत के आदेश पर ही निर्भर करेगा।
दिलचस्प बात यह भी है कि इससे पहले मार्च महीने में भी निर्वाचन आयोग ने सरकार को पत्र लिखकर चेताया था कि यदि आरक्षण प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हुई तो अदालत की अवमानना जैसी स्थिति बन सकती है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी उल्लेख किया था, जिसमें विशेष परिस्थितियों में ओबीसी आरक्षण के बिना चुनाव कराने का कानूनी विकल्प बताया गया था। हालांकि इस पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार और न्यायालय के स्तर पर ही होना है।
अब सवाल यह है कि चुनाव आखिर कब हो सकते हैं?
यदि ओबीसी आयोग 14 अगस्त तक रिपोर्ट देता है, सरकार अगस्त के अंत तक आरक्षण तय कर देती है और उसके तुरंत बाद निर्वाचन आयोग चुनाव कार्यक्रम जारी करता है, तो आयोग के बताए 90 दिन जोड़ने पर चुनाव प्रक्रिया अक्टूबर के अंत से लेकर नवंबर-दिसंबर के बीच पूरी होने की संभावना बन सकती है। हालांकि यह केवल वर्तमान समय-सीमा के आधार पर एक संभावित अनुमान है। अंतिम तारीखों की घोषणा निर्वाचन आयोग ही करेगा।
फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों का इंतजार अभी और लंबा होने वाला है। हाईकोर्ट के आदेश, ओबीसी आरक्षण, सरकार की प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की तैयारियों के बीच अब पूरे प्रदेश की नजर अगले कुछ हफ्तों के घटनाक्रम पर टिकी हुई है।
यक्ष न्यूज़ पर हम इस पूरे मामले की हर आधिकारिक अपडेट सबसे पहले आपके लिए लेकर आते रहेंगे।
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राजस्थान की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल से आई एक खबर ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी है। कभी चंबल के बीहड़ों में दहशत का दूसरा नाम रहे कुख्यात डकैत जगन गुर्जर की जेल के भीतर मौत हो गई। शुरुआती जानकारी के अनुसार उसका शव बैरक में संदिग्ध परिस्थितियों में मिला, जिसके बाद जेल प्रशासन में हड़कंप मच गया। घटना की जांच शुरू कर दी गई है और मौत के कारणों का पता लगाया जा रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर कौन था जगन गुर्जर, जिसका नाम सुनते ही कभी चंबल के गांवों में लोगों के दिल दहल जाते थे?
धौलपुर जिले के भवूतीपुरा गांव का रहने वाला जगन गुर्जर अपराध की दुनिया में 1990 के दशक में उतरा। बताया जाता है कि पारिवारिक दुश्मनी के बाद उसने हथियार उठा लिए और चंबल के बीहड़ों में अपना गिरोह बना लिया। इसके बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों में उसने वर्षों तक आतंक का साम्राज्य खड़ा किया। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसके खिलाफ हत्या, डकैती, अपहरण, रंगदारी, फिरौती, लूट और अवैध हथियारों सहित 100 से अधिक गंभीर मुकदमे दर्ज हुए।
लेकिन जगन का सबसे काला अध्याय वर्ष 2019 में सामने आया। धौलपुर में उसके गिरोह पर महिलाओं के साथ अमानवीय अत्याचार करने के गंभीर आरोप लगे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार महिलाओं के साथ मारपीट की गई, उनके कपड़े उतरवाए गए और उन्हें निर्वस्त्र घुमाने के आरोप लगे। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और जगन गुर्जर के नाम से लोगों में और अधिक भय फैल गया। इस मामले में पुलिस ने गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए थे, जबकि घटना के कुछ पहलुओं की जांच भी की गई थी।
जगन गुर्जर ने अपने जीवन में कई बार आत्मसमर्पण भी किया। उसने अपराध छोड़ने के वादे किए, लेकिन हर बार किसी न किसी नए मामले में उसका नाम सामने आता रहा।
जगन गुर्जर का आतंक इतना बढ़ चुका था कि मामला संसद तक पहुंच गया। वर्ष 2019 में नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने लोकसभा में राजस्थान की बिगड़ती कानून व्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए कुख्यात डकैत जगन गुर्जर के खिलाफ सख्त कार्रवाई और उसके एनकाउंटर की मांग की थी। इसके कुछ ही समय बाद पुलिस का दबाव बढ़ा और जगन गुर्जर ने आत्मसमर्पण कर दिया। हालांकि, आत्मसमर्पण के पीछे वास्तविक कारणों पर अलग-अलग दावे किए गए और इस पर कोई आधिकारिक निष्कर्ष नहीं दिया गया ।
पुलिस के अनुसार जेल में रहने के दौरान भी उसके नेटवर्क के सक्रिय रहने के आरोप लगते रहे, जिसके चलते उसे अजमेर हाई सिक्योरिटी जेल में रखा गया था।
और अब उसी हाई सिक्योरिटी जेल से उसकी मौत की खबर आई है। जिस व्यक्ति ने वर्षों तक चंबल में दहशत फैलाई, पुलिस को चुनौती दी और कानून से बचने की कोशिश करता रहा, उसका अंत जेल की बैरक में हुआ। फिलहाल अधिकारियों ने मौत के कारणों की जांच शुरू कर दी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि यह प्राकृतिक मौत थी, आत्महत्या थी या इसके पीछे कोई अन्य कारण था।
जगन गुर्जर की मौत के साथ चंबल के एक कुख्यात नाम का अंत जरूर हो गया, लेकिन उसके अपराधों की कहानियां आज भी उन लोगों के ज़हन में जिंदा हैं, जिन्होंने उस दौर का भय देखा था।
फिलहाल पुलिस और जेल प्रशासन पूरे मामले की जांच में जुटे हैं। यक्ष न्यूज़ इस खबर से जुड़े हर अपडेट पर नजर बनाए हुए है। जैसे ही आधिकारिक जानकारी सामने आएगी, हम आपको सबसे पहले उससे अवगत कराएंगे।
नमस्कार।
जय श्री हरि।
क्या आप जानते हैं कि सनातन धर्म में एक ऐसा व्रत भी है, जिसके बारे में धर्मग्रंथों में कहा गया है कि यदि कोई श्रद्धा और नियमपूर्वक उसका पालन करे, तो उसे वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है? यही कारण है कि इस व्रत को एकादशियों का राजा भी कहा जाता है। लेकिन इस व्रत की सबसे अद्भुत बात यह नहीं है। सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस व्रत की शुरुआत महाभारत काल के उस महायोद्धा से जुड़ी है, जिसके नाम मात्र से बड़े-बड़े महारथियों के हाथ काँप जाते थे, लेकिन जो अपनी ही भूख के सामने स्वयं को असहाय महसूस करता था। वह महायोद्धा थे—महाबली भीमसेन।
यक्ष न्यूज़ के इस विशेष धार्मिक कार्यक्रम में आपका हार्दिक स्वागत है। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं निर्जला एकादशी की वह अद्भुत कथा, जिसने करोड़ों सनातनियों की आस्था को सदियों से जीवित रखा है।
महाभारत काल में पांडवों का पूरा परिवार भगवान विष्णु का परम भक्त था। माता कुंती, धर्मराज युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और माता द्रौपदी—सभी वर्षभर आने वाली प्रत्येक एकादशी का व्रत बड़ी श्रद्धा और नियमपूर्वक करते थे। उनके लिए यह केवल उपवास नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण का पर्व था।
लेकिन उसी परिवार में एक व्यक्ति ऐसा भी था जो हर एकादशी आने पर मन ही मन दुखी हो जाता था। वह थे महाबली भीमसेन।
धर्मग्रंथों में वर्णन मिलता है कि भीम के उदर में वृक अग्नि नाम की प्रबल जठराग्नि थी। इस कारण उन्हें अत्यधिक भूख लगती थी। वे घंटों तक भोजन किए बिना रह ही नहीं सकते थे। उनके लिए उपवास करना किसी युद्ध से भी कठिन था।
हर बार जब पूरा परिवार एकादशी का व्रत करता, भीम स्वयं को अपराधी महसूस करते। उन्हें लगता कि भगवान विष्णु की भक्ति में पूरा परिवार आगे बढ़ रहा है और वे केवल अपनी भूख के कारण इस पुण्य से वंचित रह जाते हैं।
आखिर एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि इस समस्या का समाधान अवश्य ढूँढ़ेंगे। वे सीधे महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुँचे। चरणों में प्रणाम कर अत्यंत विनम्र स्वर में बोले—
“हे पितामह! मैं भगवान विष्णु का भक्त हूँ। मेरा मन भी चाहता है कि मैं भी अपने भाइयों की तरह प्रत्येक एकादशी का व्रत करूँ, लेकिन मेरी भूख इतनी प्रबल है कि मैं एक समय का भोजन भी नहीं छोड़ सकता। यदि मैं उपवास करता हूँ तो मेरा शरीर दुर्बल हो जाता है। कृपया ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरा भी कल्याण हो सके।”
महर्षि वेदव्यास ने भीम की बात बड़े ध्यान से सुनी। वे समझ चुके थे कि यह आलस्य नहीं, बल्कि वास्तविक शारीरिक विवशता है। कुछ क्षण मौन रहने के बाद उन्होंने कहा—
“हे भीम! यदि तुम वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख सकते, तो ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली निर्जला एकादशी का व्रत अवश्य करो। इस दिन सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तक अन्न और जल दोनों का त्याग करना होगा। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जो श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे वर्षभर की समस्त एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है।”
भीम ने आश्चर्य से पूछा—“क्या केवल एक दिन का इतना कठोर व्रत वास्तव में इतना महान फल दे सकता है?”
महर्षि वेदव्यास बोले—“हे भीम! भगवान केवल भूखे रहने से प्रसन्न नहीं होते। वे मनुष्य की श्रद्धा, त्याग और संकल्प को देखते हैं। यह व्रत उन्हीं के लिए है जो पूरे मन से भगवान का स्मरण करते हुए अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं।”
महर्षि के वचनों ने भीम के हृदय में नया उत्साह भर दिया। उन्होंने उसी क्षण संकल्प लिया कि चाहे शरीर साथ दे या न दे, इस बार वे निर्जला एकादशी का व्रत अवश्य करेंगे।
समय बीतता गया और ज्येष्ठ मास का वह दिन आ पहुँचा। प्रचंड गर्मी पड़ रही थी। धरती तप रही थी। तेज धूप से मानो अग्नि बरस रही थी। ऐसे समय में पानी की एक बूंद भी अमृत के समान लगती है।
लेकिन भीम ने अपने संकल्प को नहीं छोड़ा।
उन्होंने प्रातः स्नान किया, भगवान विष्णु की पूजा की और निर्जल व्रत का संकल्प लिया। धीरे-धीरे दिन चढ़ने लगा। सूर्य की तपिश बढ़ती गई। प्यास गले को सुखाने लगी। भीतर वृक अग्नि भूख को और अधिक प्रबल बना रही थी।
लोक परंपराओं में वर्णन मिलता है कि कई बार उनका शरीर लड़खड़ाया, लेकिन उन्होंने अपने संकल्प को टूटने नहीं दिया। वे बार-बार भगवान विष्णु का स्मरण करते रहे—“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय…”
पूरी रात उन्होंने धैर्य रखा। अगले दिन द्वादशी के शुभ समय में उन्होंने भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा की और दान दिया और उसके बाद पारण किया।
कहा जाता है कि उनकी अटूट श्रद्धा और दृढ़ निश्चय से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। तभी से यह एकादशी भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
धार्मिक ग्रंथों में निर्जला एकादशी की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत करने से मनुष्य के अनेक पापों का क्षय होता है, भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है और आत्मसंयम की शक्ति बढ़ती है। इस दिन जल से भरा घड़ा, छाता, पंखा, वस्त्र, अन्न और शीतल पेय का दान विशेष फलदायी माना गया है। इसका संदेश केवल स्वयं तप करना नहीं, बल्कि भीषण गर्मी में किसी प्यासे की प्यास बुझाना भी है। यदि कोई व्यक्ति इस दिन किसी जरूरतमंद को जल पिलाता है, पशु-पक्षियों के लिए परिंडे भरता है या गौसेवा करता है, तो यह भी भगवान की सेवा मानी गई है।
धर्मग्रंथों में राजा रुक्मांगद की कथा भी मिलती है, जिन्होंने एकादशी के व्रत और धर्म की रक्षा के लिए बड़े से बड़ा त्याग स्वीकार किया, लेकिन अपना वचन नहीं छोड़ा। उनकी अटूट निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अपना परम भक्त कहा। यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म का पालन तभी सार्थक होता है जब परिस्थितियाँ कठिन हों और फिर भी मनुष्य सत्य और श्रद्धा का मार्ग न छोड़े।
लेकिन यहाँ एक बात अवश्य समझनी चाहिए। निर्जला एकादशी अत्यंत कठिन व्रत है। यदि कोई व्यक्ति वृद्ध है, गर्भवती है, गंभीर बीमारी से पीड़ित है या चिकित्सकीय कारणों से लंबे समय तक बिना पानी के नहीं रह सकता, तो उसे अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए योग्य आचार्य और चिकित्सक की सलाह के अनुसार ही व्रत करना चाहिए। भगवान भाव के भूखे हैं, शरीर को अनावश्यक कष्ट देने के नहीं।
महाबली भीम की यह कथा हमें एक गहरा संदेश देती है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका शरीर नहीं, बल्कि उसका दृढ़ संकल्प है। जिसने अपने मन को जीत लिया, उसने संसार की सबसे बड़ी विजय प्राप्त कर ली। निर्जला एकादशी केवल भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध और इन्द्रियों पर विजय पाने का पावन अवसर है।
यक्ष न्यूज़ की पूरी टीम की ओर से आप सभी को निर्जला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएँ। भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे। यदि आपको यह कथा ज्ञानवर्धक लगी हो, तो इसे अपने परिवार और मित्रों के साथ अवश्य साझा करें, ताकि अधिक से अधिक लोग इस महान व्रत की महिमा को जान सकें।
नमस्कार, आप देख रहे हैं यक्ष न्यूज़।
राजस्थान के अजमेर में आयोजित नीट यूजी परीक्षा के दौरान एक मामला चर्चा का विषय बन गया, जब 18 वर्षीय छात्रा कुलसुम बानो ने आरोप लगाया कि बुर्का न उतारने के कारण उन्हें परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं दिया गया। छात्रा का कहना है कि बुर्का उनकी धार्मिक पहचान का हिस्सा है और वह इसे हटाकर परीक्षा नहीं देना चाहती थीं।
अब इस मामले के दोनों पक्षों को समझना भी जरूरी है।
पहला पक्ष छात्रा और धार्मिक स्वतंत्रता का है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक परिधान पहनने की स्वतंत्रता देता है। यदि किसी परीक्षा के नियमों के तहत सुरक्षा जांच के बाद धार्मिक पोशाक की अनुमति है, तो अभ्यर्थी को परीक्षा देने का अवसर मिलना चाहिए।
दूसरा पक्ष परीक्षा की सुरक्षा और निष्पक्षता का है। नीट जैसी राष्ट्रीय परीक्षा में नकल रोकने और सभी अभ्यर्थियों के लिए समान नियम लागू करने के उद्देश्य से सख्त ड्रेस कोड और सुरक्षा जांच की व्यवस्था की जाती है। परीक्षा केंद्र के अधिकारी उन्हीं निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं जो उन्हें दिए जाते हैं।
तो सही और गलत क्या है?
यदि छात्रा को बिना उचित सुरक्षा जांच के प्रवेश नहीं दिया गया, तो परीक्षा केंद्र का निर्णय नियमों के अनुसार माना जा सकता है। लेकिन यदि नियमों के अनुसार अतिरिक्त जांच के बाद धार्मिक परिधान के साथ परीक्षा देने की अनुमति दी जा सकती थी और फिर भी प्रवेश नहीं दिया गया, तो छात्रा की शिकायत उचित मानी जा सकती है।
अंतिम सत्य संबंधित अधिकारियों की जांच और आधिकारिक तथ्यों से ही सामने आएगा। ऐसे मामलों में भावनाओं के बजाय संविधान, परीक्षा नियमों और सभी पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सबसे महत्वपूर्ण है।
आपकी राय क्या है? क्या धार्मिक पहचान और परीक्षा सुरक्षा के बीच बेहतर व्यवस्था बनाई जानी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
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नमस्कार!
आप देख रहे हैं यक्ष न्यूज़।
भीलवाड़ा जिले की शाहपुरा पंचायत समिति की ग्राम पंचायत कोठियां से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पंचायत व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ग्राम पंचायत कोठियां में सरकारी भूमि के पट्टों के आवंटन में अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। मामले की जांच के बाद तत्कालीन ग्राम विकास अधिकारी के विरुद्ध राजस्थान असैनिक सेवाएं नियम, 1958 के नियम 16 के तहत नोटिस जारी किया गया है।
जांच रिपोर्ट में कथित रूप से यह उल्लेख किया गया है कि सरपंच के पुत्र, पत्नी, पुत्रवधू सहित अन्य रिश्तेदारों और परिचितों को नियमों के विपरीत पट्टे जारी कर लाभ पहुंचाया गया। आरोप है कि पट्टों के आवंटन में निर्धारित प्रक्रियाओं का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया गया।
बताया जा रहा है कि कुछ मामलों में खुली नीलामी जैसी अनिवार्य प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई, जबकि अन्य मामलों में आवश्यक स्वीकृतियों और नियमों के पालन को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं होगा, बल्कि जनता के विश्वास के साथ भी एक गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा।
हालांकि, यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि मामला अभी जांच के अधीन है और अंतिम निर्णय सक्षम प्राधिकारी द्वारा जांच पूरी होने के बाद ही लिया जाएगा।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है—
क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को मिले अधिकारों का उपयोग जनहित में हो रहा है, या फिर प्रभाव और रिश्तों के आधार पर फैसले लिए जा रहे हैं?
सरकारी भूमि और सरकारी संसाधन किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं होते। यह जनता की अमानत होते हैं और उनका उपयोग पूर्ण पारदर्शिता तथा नियमों के अनुरूप होना चाहिए।
यदि आपके गांव में भी किसी प्रकार की अनियमितता दिखाई देती है, तो मौन न रहें।
ग्राम सभा में प्रश्न पूछें।
सरकारी रिकॉर्ड की जानकारी प्राप्त करें।
सूचना के अधिकार का उपयोग करें।
और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित विभागों में तथ्यात्मक शिकायत दर्ज कराएं।
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"जब जनता अपने अधिकारों के प्रति सजग होती है, तब व्यवस्था को जवाबदेह होना पड़ता है।"
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भीलवाड़ा जिले के फूलियाकलां थाना क्षेत्र के ग्राम चांदमा में शनिवार को एक दर्दनाक हादसे ने पूरे गांव को गमगीन कर दिया। गांव के पास स्थित नाड़ी में नहाने गए चार से पांच बच्चों में से दो मासूम बच्चों की पानी में डूबने से मौत हो गई।
जानकारी के अनुसार, चांदमा निवासी राकेश भील के पुत्र दिलकुश भील, उम्र लगभग 11 से 12 वर्ष, तथा ग्यारसीलाल भील के पुत्र धर्मराज भील, उम्र लगभग 10 से 11 वर्ष, अन्य बच्चों के साथ नाड़ी में नहाने गए थे। इसी दौरान दोनों बच्चे गहरे पानी में चले गए और डूब गए।
घटना की सूचना मिलते ही प्रशासक भागचंद चाड़ा, फूलियाकलां पुलिस और बड़ी संख्या में ग्रामीण मौके पर पहुंचे। ग्रामीणों के अथक प्रयासों से दोनों बच्चों को पानी से बाहर निकालकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र फूलियाकलां पहुंचाया गया, जहां चिकित्सकों ने जांच के बाद दोनों बच्चों को मृत घोषित कर दिया।
फूलियाकलां थाना अधिकारी राजकुमार नायक ने बताया कि मृतक बच्चों के परिजनों की रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।
इस हृदयविदारक घटना के बाद दोनों परिवारों में कोहराम मच गया है। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं पूरे चांदमा गांव में शोक की लहर फैल गई है। गांव में हर किसी की आंखें नम हैं और हर जुबान पर यही सवाल है कि आखिर ये मासूम काल के गाल में कैसे समा गए।
यक्ष न्यूज़ सभी अभिभावकों से अपील करता है कि बरसात के मौसम में नाड़ियों, तालाबों और नदी-नालों के आसपास बच्चों को अकेले न जाने दें। थोड़ी सी सावधानी किसी परिवार की खुशियां उजड़ने से बचा सकती है।
दिवंगत मासूम दिलकुश भील और धर्मराज भील को यक्ष न्यूज़ की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर शोक संतप्त परिवारों को इस असहनीय दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
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महाराणा प्रताप विजय दिवस के अवसर पर 17 जून को उदयपुर में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक 'हल्दीघाटी विजय सार्द्ध चतु:-शती समारोह' में शामिल होने के लिए शाहपुरा क्षेत्र से सैकड़ों सनातनी रवाना होंगे। इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन प्रताप गौरव केंद्र और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के संयुक्त तत्वावधान में महाराणा भूपाल स्टेडियम में किया जाएगा।
समारोह के मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक माननीय मोहन भागवत जी होंगे। आयोजकों ने सभी श्रद्धालुओं से समय पर पहुंचने और निर्धारित प्रवेश द्वार क्रमांक एक से ही प्रवेश करने की अपील की है।
शाहपुरा क्षेत्र में इस ऐतिहासिक आयोजन को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने सनातन समाज से सपरिवार पहुंचकर महाराणा प्रताप के शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति को नमन करने का आह्वान किया है।
यक्ष न्यूज़ के लिए धन्यवाद।
राजस्थान की राजनीति का वो गढ़... जिसे टेक्सटाइल सिटी भी कहा जाता है और शाहपुरा की फड़ पेंटिंग के लिए भी जाना जाता है—यानी हमारा भीलवाड़ा! लेकिन आज भीलवाड़ा के सियासी गलियारों में एक ऐसी हलचल मची है, जिसने जयपुर से लेकर दिल्ली तक के बड़े-बड़े दिग्गजों की रातों की नींद उड़ा दी है। अब तक भीलवाड़ा की सियासत का एक ही दस्तूर था—एक तरफ कांग्रेस, दूसरी तरफ बीजेपी। सीधा मुकाबला, सीधी टक्कर! लेकिन कहते हैं ना कि राजनीति में कोई भी समीकरण हमेशा के लिए अमर नहीं होता। इस बार भीलवाड़ा के चुनावी अखाड़े में एंट्री हो चुकी है एक 'तीसरे कोण' की... नाम है—राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी यानी RLP! हनुमान बेनीवाल की इस फौज ने भीलवाड़ा के सियासी समंदर में ऐसा पत्थर फेंका है, जिसकी लहरें बीजेपी और कांग्रेस दोनों के वोट बैंक की नाव को डगमगा रही हैं। आज हम खोलेंगे भीलवाड़ा के इतिहास और आंकड़ों का वो पन्ना, जिसने इस पारंपरिक गढ़ को आज त्रिकोणीय मुकाबले का सबसे रोमांचक मैदान बना दिया है।
कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा और भीलवाड़ा के राजनीतिक मिजाज को समझना होगा। भीलवाड़ा का राजनीतिक मिजाज हमेशा से बड़ा दिलचस्प रहा है। कभी यह इलाका कांग्रेस के दिग्गज नेता सीपी जोशी का मजबूत किला हुआ करता था, तो कभी बीजेपी ने यहाँ रामलाल जाट और सुभाष बहेड़िया जैसे चेहरों के दम पर अपनी एकतरफा ताकत दिखाई। भीलवाड़ा जिले में कुल 7 विधानसभा सीटें आती हैं—भीलवाड़ा शहर, शाहपुरा, जहाजपुर, मांडल, आसींद, सहाड़ा और मांडलगढ़। इन सभी सीटों पर जातीय समीकरणों का खेल बहुत उलझा हुआ है।
आंकड़ों की बात करें तो भीलवाड़ा की सीटों पर जाट, गुर्जर, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य समाज के वोटर्स हार-जीत का फैसला करते हैं। आसींद, मांडल और सहाड़ा जैसी विधानसभा सीटों पर जाट और गुर्जर वोटर्स का जबरदस्त दबदबा है। उदाहरण के लिए, आसींद और मांडल सीटों पर करीब 50 से 60 हजार जाट और इतने ही गुर्जर मतदाता हैं, जो किसी भी प्रत्याशी की किस्मत तय कर सकते हैं। सालों से बीजेपी और कांग्रेस इसी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर अपनी गोटियां सेट करती आई थीं। दोनों ही पार्टियां मानकर चलती थीं कि अगर जाट-गुर्जर या सवर्ण वोटर्स को साध लिया, तो भीलवाड़ा फतह करना बच्चों का खेल है। लेकिन वो कहते हैं ना, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!
साल 2018 में राजस्थान की राजनीति में एक नया तूफान उठा, जिसका नाम था RLP। नागौर से उठी यह चिंगारी धीरे-धीरे मारवाड़ से होते हुए मेवाड़ की सरहद तक पहुंच गई। भीलवाड़ा में आरएलपी ने बेहद खामोशी से लेकिन बेहद मजबूती से अपने पैर पसारने शुरू किए। हनुमान बेनीवाल ने जब भीलवाड़ा के मांडल और आसींद जैसे इलाकों में हुंकार भरी, तो युवाओं की रगों में एक अलग ही जोश दौड़ गया। RLP ने सिर्फ राजनीति नहीं की, उसने भीलवाड़ा के उस युवा और किसान वर्ग को टारगेट किया, जो सालों से बीजेपी और कांग्रेस के बीच खुद को पिसा हुआ महसूस कर रहा था। बजरी माफिया का मुद्दा हो, टोल टैक्स का विरोध हो या फिर किसानों के हक की लड़ाई—आरएलपी ने इन मुद्दों को इतनी आक्रामकता से उठाया कि आम जनता को इसमें अपना नया विकल्प दिखने लगा।
अगर हम पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो भीलवाड़ा की कई सीटों पर हार-जीत का अंतर बेहद कम रहा है। आसींद और मांडलगढ़ जैसी सीटों पर जीत का अंतर महज 1500 से 4000 वोटों के बीच सिमट गया था। ऐसे में जब आरएलपी जैसी तीसरी ताकत मैदान में उतरती है और अकेले दम पर 15 हजार से लेकर 25 हजार तक वोट हासिल कर लेती है, तो पुराने सारे गणित फेल हो जाते हैं। यह वो आंकड़े हैं जो बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के पसीने छुड़ाने के लिए काफी हैं।
अब आते हैं सबसे बड़े और कड़क सवाल पर—अगर RLP भीलवाड़ा में मजबूत होती है, तो नुकसान किसका होगा? बीजेपी का या कांग्रेस का? रणनीतिकारों की मानें तो यह नुकसान किसी एक का नहीं, बल्कि दोनों का गेम बिगाड़ने वाला है।
सबसे पहले बात करते हैं कांग्रेस की। आरएलपी का सबसे मजबूत आधार जाट और किसान वर्ग है, जो पारंपरिक रूप से कई सीटों पर कांग्रेस का मजबूत साथी रहा है। अगर आरएलपी इन वोटों में सेंध लगाती है, तो कांग्रेस का बेस वोट खिसक जाता है और उसके पैर उखड़ना तय हो जाता है। अब बात करते हैं बीजेपी की। हनुमान बेनीवाल का 'यूथ फैक्टर' सीधे बीजेपी के उस युवा वोट बैंक पर चोट करता है जो सोशल मीडिया और आक्रामक राजनीति को पसंद करता है। इसके अलावा, राजपूत और अन्य ओबीसी जातियों के युवा भी बड़ी संख्या में आरएलपी की रैलियों में नजर आते हैं, जिससे बीजेपी का कोर वोट बैंक भी बिखर सकता है।
यह कोई मामूली सेंधमारी नहीं है। भीलवाड़ा की राजनीतिक हिस्ट्री बताती है कि यहाँ की जनता बदलाव पसंद करती है। जब आसींद या सहाड़ा जैसी सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला होता है, तो आरएलपी खुद भले ही सीट न जीत पाए, लेकिन वो यह तय कर देती है कि अगला विधायक कौन बनने वाला है। यानी RLP यहाँ सीधे 'किंगमेकर' या फिर सबसे बड़ा 'गेमस्पॉइलर' बनने की राह पर खड़ी है।
तो भाइयों और बहनों, भीलवाड़ा की टेक्सटाइल सिटी अब सिर्फ कपड़ा नहीं बुन रही, बल्कि राजस्थान की राजनीति का एक नया और उलझा हुआ ताना-बाना बुन रही है। एक तरफ बीजेपी का पुराना कैडर है, दूसरी तरफ कांग्रेस की साख की लड़ाई है, और बीच में खड़ी है आरएलपी की वो सेना जो किसी भी वक्त पासा पलट सकती है। अब देखना यह है कि भीलवाड़ा की जनता इस त्रिकोणीय सस्पेंस थ्रिलर में क्लाइमेक्स क्या लिखती है। क्या हनुमान बेनीवाल का जादू भीलवाड़ा के पारंपरिक किलों को ढहा पाएगा, या फिर कांग्रेस-भाजपा अपनी गद्दी बचाने में कामयाब रहेंगी? आपकी इस पूरे समीकरण पर क्या राय है? कमेंट में जरूर बताएं। देखते रहिए ग्राउंड रिपोर्ट, नमस्कार!
परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म है की कहावत को ग्राम पंडेर ने सच कर दिखाया है। जवाहर नगर निवासी स्वर्गीय भेरूजी भील की मृत्यु के बाद बेसहारा हुए दो मासूम बच्चों को गाँव ने गोद ले लिया है। भेरूजी भील के निधन के बाद पीछे रह गए दो छोटे बच्चों के सिर से माता पिता का साया पहले ही उठ चुका था। दादा के सहारे जी रहे इन बच्चों के सिर से अब वो साया भी छिन गया। तरसते अनाथ बच्चों की दयनीय स्थिति देखकर गाँव के युवा समाजसेवी गोविंद कुमार धोबी ने अपने मोबाइल से एक मार्मिक वीडियो बनाकर व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर डाला। संदेश था, एक मासूम सी पुकार, आपकी मदद की दरकार।
गोविंद की इस नेक अपील पर पंडेर के सभी ग्रामवासियों और आसपास के गाँवों ने दिल खोलकर सहयोग किया। मात्र दस से बारह दिन में पैंसठ हजार रुपये से भी अधिक की दान राशि एकत्र हो गई।
पूरी पारदर्शिता के साथ एकत्रित राशि में से साठ हजार रुपये की एफडी दोनों बच्चों के नाम करवा दी गई है। बची हुई राशि बच्चों की पढ़ाई, कपड़े और जरूरी जरूरतों के लिए नकद रूप में परिवार को सौंप दी गई है। इसके साथ ही एफडी के कागज भी परिजनों को सौंप दिए गए हैं। एफडी का समय पूरा होने पर इन बच्चों को लगभग एक लाख रुपये के आसपास की राशि मिलेगी।
यह कार्य भील समाज के पंच पटेलों, मोहल्ला वासियों और ग्रामवासियों की उपस्थिति में संपन्न हुआ। समाज जन और ग्रामवासियों ने इस नेक कार्य के लिए पहल करने वाले गोविंद कुमार धोबी और एक एक रुपया दान देने वाले सभी दानदाताओं तथा समस्त ग्रामवासियों का हृदय से आभार जताया है।
नमस्कार, यक्ष न्यूज़ के इस विशेष बुलेटिन में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। राजस्थान के ग्रामीण अंचलों, ढाणियों और गांवों की चौपालों पर इस समय सिर्फ और सिर्फ एक ही चर्चा सबसे ऊपर है कि गांव की सरकार यानी सरपंच के चुनाव आखिर कब होने जा रहे हैं। हर कोई अपनी-अपनी राजनीतिक गणित लगा रहा है और कयासों का बाजार बेहद गर्म है। आज के इस विस्तृत और विशेष विश्लेषण में हम न केवल राजस्थान में पंचायती राज के सुनहरे इतिहास पर बात करेंगे, बल्कि आज की ताजा तरीन खबरों और सबसे बड़े सवाल पर गहराई से मंथन करेंगे कि क्या वाकई जुलाई के महीने में सरपंच चुनाव संभव हैं। अगर जुलाई में चुनाव होते हैं तो उसके पीछे क्या मजबूत कारण हैं, और अगर जुलाई में चुनाव नहीं हो पाते हैं तो उसके पीछे कौन सी बड़ी प्रशासनिक और व्यावहारिक अड़चनें खड़ी हैं। अगले पांच से छह मिनट में आपको इस पूरे चुनावी चक्रव्यूह की एक-एक परत खुलकर समझ में आने वाली है।
सबसे पहले हम रुख करते हैं राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था के गौरवशाली और ऐतिहासिक सफर की ओर। राजस्थान का इतिहास इस मामले में बेहद समृद्ध रहा है क्योंकि पूरे भारत वर्ष में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण यानी त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का शंखनाद करने वाला पहला राज्य हमारा राजस्थान ही था। साल उन्नीस सौ उनसठ में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के ऐतिहासिक नागौर जिले की धरती से इस क्रांतिकारी व्यवस्था की शुरुआत की थी। इसके बाद साल उन्नीस सौ तिरानवे में जब संविधान का तिहत्तरवां संशोधन लागू हुआ, तो पंचायतों को एक मजबूत संवैधानिक दर्जा मिला और राजस्थान में हर पांच साल में नियमित रूप से शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराने का एक मजबूत ढांचा तैयार हुआ। राजस्थान की ग्रामीण जनता ने हमेशा से ही अपने सरपंच को चुनने में देश में सबसे ज्यादा उत्साह दिखाया है। यहां का सरपंच चुनाव अक्सर विधानसभा और लोकसभा के चुनावों से भी ज्यादा आक्रामक, दिलचस्प और प्रतिष्ठा की लड़ाई बन जाता है, जहां एक-एक वोट के लिए कड़ी टक्कर देखने को मिलती है।
अब बात करते हैं मौजूदा वक्त की ताजा खबरों और प्रशासनिक गलियारों से आ रही सबसे बड़ी हलचलों की। पिछले काफी समय से इस बात की चर्चाएं थीं कि सरकार प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर इन चुनावों को इस साल के अंत तक टालना चाहती है, लेकिन हाल ही में माननीय हाईकोर्ट के कड़े रुख और सख्त टिप्पणियों ने पूरे परिदृश्य को बदल कर रख दिया है। अदालत के सख्त निर्देशों के बाद राज्य निर्वाचन आयोग और सरकारी अमला पूरी तरह से एक्शन मोड में आ चुका है। ताजा समाचार यह है कि राज्य के सभी जिलों में फोटोयुक्त नई मतदाता सूचियों को अपडेट करने, वार्डों के नए सिरे से पुनर्गठन करने और आरक्षण की लॉटरी निकालने की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस बार का चुनाव वोटिंग के तरीके को लेकर भी ऐतिहासिक होने वाला है क्योंकि इस बार हाइब्रिड मॉडल अपनाया जा रहा है। जिला परिषद और पंचायत समिति के लिए जहां ईवीएम मशीनें चलेंगी, वहीं सरपंच और पंच के पदों के लिए जनता को पुराने पारंपरिक तरीके से मतपत्र यानी बैलेट पेपर पर मुहर लगानी होगी, जिसके लिए सभी जिलों में मतपेटियों की मरम्मत और ग्रीसिंग का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है।
अब आते हैं आज के सबसे बड़े और सबसे अहम सवाल पर कि क्या इसी जुलाई के महीने में राजस्थान में सरपंच चुनाव होने संभव हैं। अगर हम उन कारणों को देखें जो यह इशारा करते हैं कि जुलाई में चुनाव बिल्कुल संभव हैं, तो उनमें सबसे पहला और सबसे बड़ा कारण माननीय हाईकोर्ट का कानूनी दबाव है। अदालत ने साफ किया है कि स्थानीय निकायों और पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने के बाद चुनावों में ज्यादा देरी नहीं की जा सकती, जिससे निर्वाचन आयोग पर जुलाई के भीतर प्रक्रिया शुरू करने का भारी दबाव है। दूसरा बड़ा कारण यह है कि राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी तरफ से मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने और मतपेटियों को तैयार करने जैसे तमाम शुरुआती तकनीकी काम लगभग नब्बे फीसदी तक पूरे कर लिए हैं। तीसरा कारण यह है कि राजनीतिक दल भी आंतरिक रूप से यह मानते हैं कि चुनावी तैयारियों को ज्यादा लंबा खींचने से ग्रामीण स्तर पर असंतोष बढ़ सकता है, इसलिए प्रशासनिक और कानूनी तौर पर देखा जाए तो जुलाई के आखिरी हफ्ते तक चुनाव प्रक्रिया का आगाज करना पूरी तरह से मुमकिन नजर आता है।
लेकिन सिक्कों का दूसरा पहलू भी है, जो यह बताता है कि जुलाई के महीने में चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से क्यों संभव नहीं है या इसमें क्या बड़ी रुकावटें आ सकती हैं। जुलाई में चुनाव न होने का सबसे पहला और सबसे व्यावहारिक कारण है मानसून का मौसम। जुलाई के महीने में राजस्थान के बड़े हिस्से में भारी बारिश का दौर शुरू हो जाता है, जिससे ग्रामीण इलाकों की सड़कें, संपर्क मार्ग और कई बार मतदान केंद्र जलभराव की चपेट में आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में दूरदराज के गांवों और ढाणियों तक पोलिंग पार्टियों को भेजना, मतपेटियों को सुरक्षित रखना और ग्रामीणों का भारी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। दूसरा बड़ा कारण यह है कि जुलाई का महीना किसानों के लिए खरीफ की फसल की बुवाई का सबसे व्यस्त समय होता है। गांव की एक बहुत बड़ी आबादी इस दौरान खेतों में दिन-रात काम में जुटी रहती है, जिससे मतदान का प्रतिशत गिरने का खतरा रहता है। तीसरा कारण यह है कि भले ही निर्वाचन आयोग ने तैयारियां तेज कर दी हों, लेकिन आरक्षण की लॉटरी और वार्डों के पुनर्गठन को लेकर जमीनी स्तर पर जो प्रशासनिक और कानूनी आपत्तियां आती हैं, उनके निपटारे में अक्सर उम्मीद से ज्यादा समय लग जाता है, जो चुनाव को अगस्त या सितंबर तक धकेल सकता है।
इन तमाम संभावनाओं, तर्कों और ताजा समाचारों को अगर एक तराजू में तौला जाए, तो यह साफ है कि कानूनी मजबूरियां जुलाई में चुनाव कराने की तरफ इशारा कर रही हैं, जबकि मौसम और ग्रामीण जनजीवन की व्यावहारिक स्थितियां इसे थोड़ा आगे बढ़ाने की वकालत कर रही हैं। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राज्य निर्वाचन आयोग जुलाई के अंत तक तारीखों का एलान कर भी देता है, तो मुख्य चरण का मतदान अगस्त के पहले या दूसरे हफ्ते तक जा सकता है। खैर, ऊंट किस करवट बैठेगा इसका अंतिम फैसला निर्वाचन आयोग के आधिकारिक नोटिफिकेशन से ही साफ होगा, लेकिन एक बात तय है कि दावेदारों ने गांवों में अपनी फील्डिंग सजानी शुरू कर दी है। राजस्थान की ग्रामीण राजनीति और सरपंच चुनाव के इस महासंग्राम से जुड़ी हर एक सच्ची और पक्की खबर सबसे पहले पाने के लिए देखते रहिए यक्ष न्यूज़। धन्यवाद।
नमस्कार दोस्तों, फूलियाकलां से इस वक्त की बड़ी और सनसनीखेज खबर आ रही है, जहाँ अवैध बजरी के परिवहन को लेकर अब स्थानीय लोगों में भारी उबाल और आक्रोश देखा जा रहा है।
पूरी घटना फूलियाकलां उपखंड क्षेत्र के सांपला रोड स्थित खारी नदी पुलिया की है। यहाँ आज उस समय हड़कंप मच गया, जब बजरी से भरे एक तेज़ रफ्तार डंपर ने गेहूं से लदे एक ट्रैक्टर को जोरदार टक्कर मार दी। बताया जा रहा है कि ट्रैक्टर गेहूं लेकर केकड़ी की तरफ जा रहा था, तभी पुलिया के पास इस डंपर ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। टक्कर इतनी भीषण थी कि ट्रैक्टर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया और मौके पर अचानक अफरा-तफरी मच गई।
गनीमत रही कि इस हादसे में ट्रैक्टर चालक की जान बाल-बाल बच गई और कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन इस घटना ने स्थानीय ग्रामीणों के गुस्से को भड़का दिया है।
ग्रामीणों का साफ तौर पर आरोप है कि क्षेत्र में अवैध बजरी से भरे ओवरलोड डंपर बेखौफ होकर मौत बनकर दौड़ रहे हैं। प्रशासन और पुलिस की ढिलाई के कारण इन बजरी माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि आए दिन सड़कों पर गंभीर हादसे हो रहे हैं और आम राहगीरों का निकलना दूभर हो गया है।
घटना की सूचना पर फूलियाकलां पुलिस ने मौके पर पहुँचकर स्थिति को संभाला और जांच शुरू की, लेकिन स्थानीय लोगों ने अब साफ चेतावनी दे दी है कि अगर अवैध बजरी के इस काले कारोबार और इन बेलगाम डंपरों पर तुरंत सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।
नमस्कार दोस्तों, यक्ष न्यूज़ पर इस वक्त की एक बड़ी और गंभीर खबर।
भगवान की जमीन और मंदिरों की संपत्ति पर भू-माफियाओं की नजर का एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। केकड़ी के ग्राम सापंदा में स्थित श्री गोपाल जी महाराज मंदिर की भूमि को बचाने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर वैष्णव बैरागी समाज ने पूरी तरह मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार को समाज के सैकड़ों लोगों ने आक्रोश जताते हुए उपखंड अधिकारी यानी एसडीएम कार्यालय का घेराव किया और प्रशासन को एक सख्त ज्ञापन सौंपा।
वैष्णव बैरागी विकास समिति के नेतृत्व में सौंपे गए ज्ञापन के अनुसार, ग्राम सापंदा के खसरा नंबर 376, 377, 379, 380, 381, 382 और 383 राजस्व रिकॉर्ड में पूरी तरह से मंदिर श्री गोपाल जी महाराज स्थान देह के नाम दर्ज हैं। इस पवित्र भूमि पर वैष्णव समाज के लोग पीढ़ियों से खेती करते आ रहे हैं। इसी खेती से होने वाली आय से उनके परिवारों का पालन-पोषण होता है और ठाकुर जी के भोग व मंदिर की सेवा-पूजा की व्यवस्था संभाली जाती है।
मामले ने तब तूल पकड़ा जब बीती 2 जून को पड़ोसी खातेदार और उनके परिजनों ने लाठी-डंडों के साथ मंदिर की भूमि पर धावा बोल दिया। आरोप है कि इन लोगों ने वहाँ मौजूद पुजारी परिवार की महिलाओं के साथ बेहद अभद्र व्यवहार किया, गाली-गलौज की और उनके साथ मारपीट की। इस घटना को लेकर पीड़ित परिवार द्वारा सरवाड़ पुलिस थाने में नामजद रिपोर्ट भी दर्ज कराई गई थी। लेकिन घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस प्रशासन द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जिससे पूरे समाज में भारी आक्रोश फैल गया।
जैसा कि अक्सर देखा जाता है, यहाँ भी भगवान की जमीन को हड़पने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञापन में बताया गया कि मंदिर भूमि से पूर्व में जो रास्ता छोड़ा गया था, उस पर इन लोगों ने धीरे-धीरे पूरी तरह अवैध कब्जा कर लिया। अब ये लोग मंदिर की मुख्य उपजाऊ भूमि के बिल्कुल बीच में से जबरन नया रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे हैं और विरोध करने पर जानलेवा हमला कर रहे हैं।
इसी को लेकर वैष्णव समाज ने एसडीएम को ज्ञापन सौंपकर प्रशासन के सामने अपनी मुख्य मांगें रखी हैं। समाज का कहना है कि राजस्व विभाग की टीम को मौके पर भेजकर मंदिर की जमीन और रास्ते का तुरंत सरकारी सीमांकन करवाया जाए, और मंदिर की जमीन पर किए गए सभी अवैध कब्जों को तुरंत हटाया जाए। साथ ही महिलाओं से मारपीट और बदसलूकी करने वाले दबंगों को पुलिस तुरंत गिरफ्तार करे और पीड़ित पुजारी परिवार की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। समाज ने साफ चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने जल्द ही मंदिर की भूमि की सुरक्षा और पीड़ित परिवार को न्याय नहीं दिलाया, तो इस आंदोलन को पूरे जिले और प्रदेश स्तर पर और उग्र किया जाएगा।
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नमस्कार, आप देख रहे हैं यक्ष न्यूज ।
विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर चल रहे "स्वच्छ गांव–सुरक्षित जलवायु" अभियान के तहत आज प्रशासन ने एक बड़ी कार्रवाई की है। कादेड़ा ग्राम पंचायत में सफाई व्यवस्था में भारी लापरवाही पाए जाने पर विकास अधिकारी दिशी शर्मा ने कड़ा रुख अपनाया है।
दरअसल, विकास अधिकारी जब जनसुनवाई और औचक निरीक्षण के लिए कादेड़ा ग्राम पंचायत पहुँचीं, तो वहां स्वच्छता के दावे खोखले नजर आए। गांव की सड़कों, नालों और नालियों की नियमित सफाई पूरी तरह ठप मिली। सरकारी नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए, राज्य सरकार द्वारा तय किए गए चार आवश्यक रजिस्टरों का रिकॉर्ड भी मेंटेन नहीं किया गया था।
इस बदहाली को देखकर विकास अधिकारी ने तुरंत एक्शन लिया। उन्होंने संबंधित ग्राम विकास अधिकारी, ग्राम पंचायत प्रशासक और सफाई ठेकेदार को 'कारण बताओ नोटिस' जारी कर दिया है। मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई है और सख्त हिदायत दी गई है कि अगले तीन दिन के भीतर कादेड़ा में पूरी सफाई चकाचक होनी चाहिए।
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शाहपुरा-बनेड़ा क्षेत्र के फूलियाकलां कस्बे में विधायक डॉ. लालाराम बैरवा की मुख्य आतिथ्य में ग्राम पंचायत स्तरीय जनसुनवाई शिविर का आयोजन किया गया. इस शिविर में जहां एक ओर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों द्वारा जनता को राहत देने के बड़े प्रयास किए गए, वहीं दूसरी ओर निर्माण कार्य की गुणवत्ता, स्थानीय बुनियादी मुद्दों और भारी पुलिस जाब्ते को लेकर नागरिकों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं और सोशल मीडिया पर लोगों की राय भी सामने आई है.
कस्बे के नाथजी के आसन परिसर में आयोजित इस शिविर के दौरान विधायक ने ग्रामीणों के अभाव-अभियोग सुने और कई शिकायतों का मौके पर ही हाथों-हाथ समाधान कर लोगों को संतुष्ट किया. इस दौरान गरीब और जरूरतमंद परिवारों को बड़ी राहत देते हुए १६ लाभार्थियों को मकान के आवासीय पट्टे वितरित किए गए, जबकि दो दिव्यांगजनों को ट्राईसाइकिल प्रदान कर उन्हें संबल दिया गया. इसके साथ ही, क्षेत्र के विकास को गति देते हुए विधायक ने राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय खेल मैदान में ओपन जिम का वर्चुअल लोकार्पण किया और तेजाजी मंदिर के पास स्नान घाट तथा भील समाज सामुदायिक भवन का शिलान्यास कर क्षेत्रवासियों को सौगातें दीं.
इस जनसुनवाई और लोकार्पण समारोह में लोकार्पित निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर भी एक बड़ा मुद्दा सामने आया है. जनसुनवाई के दौरान विधायक द्वारा जिस अटल प्रगति पथ का वर्चुअल लोकार्पण किया गया, उसके बारे में स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि लगभग २ करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बना यह मार्ग अपने उद्घाटन से पहले ही क्षतिग्रस्त हो गया. इस मार्ग के टूटने से निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर ग्रामीणों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं और इसकी उच्च स्तरीय जांच की मांग उठाई है.
इसके अलावा जनसुनवाई के दौरान सुरक्षा के लिहाज से आयोजन स्थल पर भारी संख्या में पुलिस जाब्ता तैनात रहा. इस भारी पुलिस बल की मौजूदगी को लेकर सोशल मीडिया पर भी कुछ स्थानीय लोगों ने अपनी राय रखनी शुरू कर दी. व्हाट्सएप ग्रुप्स पर कुछ नागरिकों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि धरातल पर काम केवल आश्वासनों तक सीमित हैं, इसलिए जनसुनवाई के दौरान ऐसी भारी सुरक्षा व्यवस्थाएं भी देखनी पड़ती हैं.
इसके साथ ही लोगों ने कस्बे की अन्य मुख्य बुनियादी समस्याओं को लेकर भी सोशल मीडिया पर अपनी राय रखी. ग्रामीणों ने बस स्टैंड पर नाला चोक होने के कारण सड़क पर जमा हुए पानी का वीडियो साझा करते हुए रोष जताया कि ठेकेदार द्वारा नाला निर्माण का कार्य पूरा करने के बजाय केवल मिट्टी डालकर खानापूर्ति कर दी गई है, जिससे आमजन परेशान है. सोशल मीडिया पर लोगों ने तंज करते हुए यहाँ तक लिखा कि विधायक जी को क्षेत्र में पैदल चलकर मौका मुआयना करना चाहिए था ताकि उन्हें जमीनी समस्या का अहसास हो सके.
कुल मिलाकर, फूलियाकलां का यह पूरा घटनाक्रम इस समय क्षेत्र में सरकारी राहत और जनता की उम्मीदों के बीच संवाद का एक बड़ा विषय बना हुआ है.
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भीलवाड़ा से बड़ी खबर! जमीन विवाद की शिकायत लेकर पहुंचे परिवादी को धमकाने और गाली देने के आरोप में बनेड़ा थानाधिकारी बच्छराज चौधरी हुए लाइन हाजिर। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद एसपी सागर राणा ने की बड़ी कार्रवाई, एएसपी हेमंत कुमार को सौंपी जांच। लेकिन कहानी में आया नया मोड़, थानाधिकारी के समर्थन में उतरे सैकड़ों ग्रामीण, बोले— यह निष्पक्ष अधिकारी के खिलाफ रची गई बड़ी साजिश है!
नमस्कार, यक्ष न्यूज़ में आपका स्वागत है। भीलवाड़ा जिले के बनेड़ा थाना क्षेत्र से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक जमीन विवाद के मामले में कार्रवाई करने के बजाय परिवादी के साथ ही बदसलूकी करने के आरोप में थानाधिकारी बच्छराज चौधरी पर गाज गिरी है।
पूरा मामला बबरोणा गांव का है, जहां के निवासी प्रभुलाल कुम्हार ने तेरह मई को एक शिकायत दर्ज कराई थी कि पड़ोसियों ने उनकी जमीन पर मलबे का ढेर लगाकर रास्ता बंद कर दिया है। पुलिस ने मौके पर जाकर जांच की और शिकायत को सही पाया। इसके बाद बाईस मई को परिवादी प्रभुलाल को थाने बुलाया गया। परिवादी का आरोप है कि चैंबर में उनकी बात सुनने के बजाय थानाधिकारी ने उनके साथ गाली-गलौज की, और जब उन्होंने कानून की बात की तो साहब भड़क गए और उन्हें थाने में बंद करने की धमकी दी। परिवादी ने यह भी आरोप लगाया कि उनके साथ अपराधियों जैसा बर्ताप किया गया और पांच घंटे तक अवैध रूप से थाने में बिठाकर रखा गया।
इस पूरी घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया, जिसमें थानाधिकारी कथित तौर पर यह कहते सुनाई दे रहे हैं कि तुमने कोई चूड़ियां पहन रखी हैं क्या, खंभे गाड़कर जाली लगा दो और जो करना है आज ही कर लो। इस वीडियो के सामने आने के बाद भीलवाड़ा के पुलिस अधीक्षक सागर राणा ने तुरंत कड़ा एक्शन लेते हुए बनेड़ा थानाधिकारी बच्छराज चौधरी को लाइन हाजिर कर दिया है और मामले की विस्तृत जांच एएसपी हेमंत कुमार को सौंप दी है। दूसरी तरफ पुलिस का कहना है कि यह विवाद बाड़े के गेट को बाहर निकालने को लेकर था और दोनों पक्षों को समझाकर शांत करने का प्रयास किया जा रहा था।
इस पूरी कार्रवाई के बाद अब यह मामला एक नया मोड़ ले चुका है। थानाधिकारी को हटाए जाने के विरोध में बनेड़ा और रायला क्षेत्र के सैकड़ों ग्रामीण एकजुट होकर समर्थन में उतरे हैं। ग्रामीणों के एक बड़े प्रतिनिधिमंडल ने उपखंड अधिकारी और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर बच्छराज चौधरी को बेकसूर बताया है।
ग्रामीणों का साफ कहना है कि कुछ असामाजिक तत्वों ने जानबूझकर थानाधिकारी की साफ-सुथरी और ईमानदार छवि को खराब करने के लिए एक भ्रामक और एडिटेड वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया है। ग्रामीणों ने प्रशासन को बताया कि बच्छराज चौधरी एक बेहद ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी हैं, जिनके कार्यकाल में क्षेत्र की कानून व्यवस्था हमेशा मजबूत रही है और आम जनता के बीच सुरक्षा का भरोसा बढ़ा है। ग्रामीणों ने पुरजोर मांग की है कि इस पूरे वीडियो की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाए और बच्छराज चौधरी को दोबारा बनेड़ा थाने में ही बहाल किया जाए।
इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। भीलवाड़ा और देश-दुनिया की तमाम बड़ी खबरों को सबसे पहले देखने के लिए हमारे चैनल यक्ष न्यूज़ को अभी सब्सक्राइब करें और बेल आइकन जरूर दबाएं। धन्यवाद, जय हिंद!
नमस्कार, यक्ष न्यूज़ में इस समय की बड़ी और सनसनीखेज खबर। भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी कार्रवाई में राजस्थान के पाली जिले से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बाली तहसील के लाताड़ा गांव में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी की टीम ने एक बड़ी कार्रवाई को अंजाम देते हुए पटवारी विक्रम धीर को आठ हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया है। सरकारी तंत्र में बैठे इस भ्रष्ट अधिकारी की करतूतों से पूरा इलाका इस कदर त्रस्त था कि जैसे ही ग्रामीणों को इस गिरफ्तारी की भनक लगी, भारी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए।
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ग्रामीणों ने पटवारी की गिरफ्तारी पर मौके पर ही ढोल बजाकर अपनी खुशी जाहिर की, जो यह साफ दर्शाता है कि आम जनता इस प्रशासनिक भ्रष्टाचार से कितनी ज्यादा परेशान थी। ग्रामीणों के मुताबिक, आरोपी पटवारी बिना अवैध वसूली और बिना चढ़ावा लिए किसी भी गरीब या आम नागरिक का कोई सरकारी काम नहीं करता था। सरकारी दफ्तरों में फैले इस भ्रष्टाचार पर आपकी क्या राय है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके अपनी राय जरूर बताएं और इस वीडियो को लाइक भी करें।
इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए एसीबी ने पूरी योजनाबद्ध तरीके से जाल बिछाया था। शिकायतकर्ता के मुताबिक, भूमि के नामांतरण, विभाजन और सीमांकन जैसे जरूरी सरकारी काम के बदले पटवारी ने कुल ग्यारह हजार रुपए की मोटी घूस मांगी थी। इसमें से पांच हजार रुपए वह पहले ही ले चुका था और बाकी की रकम के लिए लगातार दबाव बना रहा था। परिवादी की शिकायत का सत्यापन करने के बाद एसीबी की टीम ने सोमवार को जाल बिछाकर आरोपी पटवारी को रंगे हाथों दबोच लिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ हुई इस बड़ी कार्रवाई की वीडियो को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक शेयर करें और कमेंट में अपनी बात रखना न भूलें।
गौवंश की रक्षा और बीमार गायों के इलाज के लिए समर्पित बालाजी गौवंश हेल्पलाइन टीम की ओर से जहाजपुर तहसील में संगठन का विस्तार करते हुए दो बड़ी नियुक्तियां की गई हैं। यह संगठन रात-दिन संकट में फंसे गौवंश को नया जीवन देने के लिए पूरी तरह सक्रिय है। इसी कड़ी में, पंडेर के जाने-माने गौसेवक सुरेश जी भाट के सेवा भाव को देखते हुए शाहपुरा जिला अध्यक्ष राजेश जी सेन एवं भीलवाड़ा जिला अध्यक्ष अभिषेक जी की विशेष अनुशंसा पर उन्हें बालाजी गौवंश हेल्पलाइन टीम में जहाजपुर तहसील उपाध्यक्ष के प्रतिष्ठित पद पर मनोनीत किया गया है।
इसी के साथ, गौसेवा के कारवां को और गति देने के लिए संगठन ने एक और महत्वपूर्ण घोषणा की है। गौसेवा के प्रति अटूट लगन रखने वाले नीरज भाट को भी शाहपुरा जिला अध्यक्ष राजेश जी सेन एवं भीलवाड़ा जिला अध्यक्ष अभिषेक जी की अनुशंसा पर बालाजी गौवंश हेल्पलाइन टीम का जहाजपुर तहसील प्रचारक मनोनीत किया गया है।
इन दोनों ही महत्वपूर्ण नियुक्तियों की घोषणा संगठन के संस्थापक एवं अध्यक्ष खुशराज वैष्णव द्वारा की गई है। इस नई जिम्मेदारी के मिलने के बाद संस्था के पदाधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि सुरेश जी भाट और नीरज भाट मिलकर पूरी ऊर्जा के साथ काम करेंगे और गौसेवा के अभियान को और मजबूती देंगे। जहाजपुर तहसील उपाध्यक्ष के पद पर सुरेश जी भाट और तहसील प्रचारक के पद पर नीरज भाट के मनोनीत होने पर क्षेत्र के गौसेवकों की ओर से दोनों को ढेरों शुभकामनाएं मिल रही हैं।
बालाजी गौवंश हेल्पलाइन की इस नई पहल और दोनों गौसेवकों की नियुक्ति पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। वीडियो को लाइक और शेयर करें और यक्ष न्यूज़ को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें।
राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के फूलिया कलां से एक बेहद हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां राशन वितरण में गंभीर धांधली और भ्रष्टाचार के बड़े आरोप लगे हैं। दरअसल फूलिया कलां में राशन डीलर के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा उस वक्त फूट पड़ा जब राशन डीलर पर यह संगीन आरोप लगाया गया कि यहां सालों पहले मर चुके लोगों के नाम पर भी फर्जी तरीके से सरकारी गेहूं उठाया जा रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि जो लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन्हें भी रिकॉर्ड में जिंदा दिखाकर उनके हक का राशन निकाला जा रहा था। इसी शिकायत को लेकर समाजसेवी लालाराम रावण के नेतृत्व में ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर के नाम तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा था, जिसके बाद शनिवार को भीलवाड़ा से प्रवर्तन निरीक्षक डॉक्टर मीनाक्षी मीणा जांच दल के साथ खुद उचित मूल्य की दुकान पर जांच करने पहुंचीं।
जांच दल के मौके पर पहुंचते ही राशन दुकान के स्टॉक में एक बहुत बड़ी गड़बड़ी जरूर पकड़ में आ गई है। जब जांच टीम ने सरकारी पॉस मशीन के ऑनलाइन रिकॉर्ड को देखा तो उसमें केवल एक किलो गेहूं होना दर्ज था, यानी कागजों में स्टॉक लगभग खाली था। लेकिन जब जांच दल ने मौके पर मौजूद गोदाम की तलाशी ली, तो वहां की हकीकत देखकर हर कोई हैरान रह गया। गोदाम के अंदर गेहूं के पूरे अड़सठ कट्टे भरे हुए पाए गए।
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ऑनलाइन मशीन में स्टॉक खाली था, तो गोदाम में यह अड़सठ कट्टे गेहूं कहाँ से आए और इन्हें यहाँ क्यों रखा गया था। हालांकि मृतकों के नाम पर गेहूं उठाने के आरोपों की पूरी सत्यता और जांच रिपोर्ट आना अभी बाकी है, लेकिन मौके पर मिले इस संदिग्ध स्टॉक ने राशन वितरण की व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बड़ी गड़बड़ी के सामने आने के बाद जांच दल ने गेहूं के कट्टों को जब्त कर लिया है और मामले की गहराई से जांच शुरू कर दी है।
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दिनांक सत्ताईस मई दो हज़ार छब्बीस । समय, सुबह के करीब साढ़े पांच बजे । राजस्थान के अजमेर जिले में अरांई-बोराड़ा क्षेत्र के श्रीरामपुरा गांव के पास एक सन्नाटे को चीरती हुई आवाज गूंजती है। सड़क किनारे खड़ी एक एसयूवी गाड़ी अचानक धू-धू कर जलने लगती है। आग की लपटें इतनी तेज थीं कि दूर-दूर तक सिर्फ धुआं दिखाई दे रहा था। उसी वक्त वहां से एक डम्पर गुजरता है। ड्राइवर जलती हुई कार को देखकर अपनी गाड़ी रोकता है और हिम्मत जुटाकर एसयूवी का पिछला गेट खोल देता है। दरवाजा खुलते ही एक खौफनाक मंजर सामने आता है। आग की लपटों से घिरी एक महिला तड़पती हुई कार से बाहर सीधे खेत में गिर पड़ती है। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया जाता है, लेकिन रास्ते में ही वह दम तोड़ देती है। जब आग बुझती है, तो कार के अंदर का नजारा देखकर पुलिस के भी होश उड़ जाते हैं। गाड़ी के भीतर तीन और इंसानी जिस्म जलकर पूरी तरह कंकाल बन चुके थे।
मरने वालों की पहचान इलाके के रसूखदार कांग्रेस नेता रामसिंह चौधरी (उम्र 50 वर्ष), उनकी मां और पूर्व सरपंच पूसीदेवी (उम्र 78 वर्ष), उनकी दूसरी पत्नी सुरज्ञान (उम्र 40 वर्ष), और रिश्ते में मौसेरी बहन लगने वाली महिमा (उम्र 34 वर्ष) के रूप में होती है। पूरे इलाके में मातम पसर जाता है। रोते-बिलखते परिवार वाले पुलिस के सामने एक सीधी सी कहानी रखते हैं। उनका कहना था कि बुजुर्ग मां पूसीदेवी को अचानक सांस लेने में तकलीफ हुई थी, इसलिए पूरा परिवार आनन-फानन में उन्हें अस्पताल लेकर जा रहा था और रास्ते में यह भयानक हादसा हो गया। देखने वालों को भी यही लगा कि यह एक बेहद दर्दनाक रोड एक्सीडेंट था। लेकिन अजमेर के पुलिस अधीक्षक हर्षवर्धन अग्रवाला और उनकी टीम को इस पूरी कहानी में कुछ अजीब लग रहा था। कुछ ऐसा, जो आंखों के सामने था पर दिखाई नहीं दे रहा था।
जब पुलिस और फॉरेन्सिक साइंस लेबोरेटरी यानी एफएसएल की टीम ने इस 'हादसे' की बारीकी से जांच शुरू की, तो उनके हाथ पांच ऐसी कड़ियां लगीं जिन्होंने इस पूरे के को एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया।
पहला शक तब हुआ जब कार से बाहर खेत में गिरी दूसरी पत्नी सुरज्ञान के शव को देखा गया। उसके शरीर पर सिर्फ आग से जलने के मामूली निशान थे, बल्कि उसके गले और जिस्म पर धारदार हथियार के गहरे घाव थे। एक एक्सीडेंट में ऐसे धारदार हथियार के निशान होना नामुमकिन था। दूसरी अजीब बात यह थी कि जली हुई एसयूवी की ड्राइवर सीट पूरी तरह खाली थी, आगे की सीटों को फोल्ड किया गया था और लाशें पीछे की सीटों पर ठूसी गई थीं। तीसरी हैरान करने वाली बात तब सामने आई जब पुलिस और एमओबी की टीम रामसिंह के खेत पर बने मकान पर पहुंची। घर का कोना-कोना पानी से धोकर साफ किया जा चुका था, बिस्तर धोए जा चुके थे। लेकिन जैसे ही फॉरेन्सिक टीम ने जांच की, तो कमरे की दीवारों, जमीन, बिस्तरों और चारपाइयों पर मौजूद खून के निशान चीख-चीखकर किसी अनदेखी कहानी की गवाही देने लगे। यहाँ तक कि घर में मौजूद रामसिंह की पहली पत्नी सुनीता के हाथ पर भी ताजा कट के निशान थे। चौथी कड़ी ग्रामीणों ने जोड़ी, जिन्होंने बताया कि बुधवार की रात इस घर के भीतर बहुत ही भयंकर झगड़ा हुआ था। और पांचवीं सबसे बड़ी वजह यह थी कि मकान के परिसर में खड़े ट्रैक्टर की टंकी का ढक्कन खुला था और उसमें से डीजल गायब था।
अब पुलिस समझ चुकी थी कि यह कोई एक्सीडेंट नहीं, बल्कि ठंडे दिमाग से बुना गया एक खौफनाक चक्रव्यूह है। एसपी हर्षवर्धन अग्रवाला के निर्देश पर पुलिस ने तुरंत रामसिंह की पहली पत्नी सुनीता, उसकी बेटी सरिता और नाबालिग बेटे को हिरासत में ले लिया। शुरुआत में तो मां-बच्चों ने कहानी बनाई कि रामसिंह राजनीति में थे और उनके कई पुराने दुश्मन थे। लेकिन जब पुलिस ने तीनों को अलग-अलग बैठाकर मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की, तो महज कुछ ही मिनटों में तीनों का झूठ का ताना-बाना बिखर गया और तीनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। सबसे पहले आरोपी नाबालिग बेटा बुरी तरह टूट गया और उसने जो राज उगला, उसने सुनने वाले हर शख्स के पैरों तले जमीन खिसका दी।
जांच में सामने आया कि इस खौफनाक हत्याकांड की पटकथा घरेलू कलह और जुल्म से लिखी गई थी। रामसिंह ने साल 2005 में सुनीता से शादी की थी, जिससे उनके दो बच्चे (बेटी सरिता और एक बेटा) हैं। लेकिन एक पुराने मारपीट के मामले में रामसिंह को जेल जाना पड़ा था, जहाँ उसकी मुलाकात एक महिला वकील सुरज्ञान से हुई जो उसका मुकदमा लड़ रही थी। जेल की मुलाकातों के बाद दोनों के बीच प्यार हुआ और बाद में रामसिंह ने सुरज्ञान से शादी कर ली और उसे अपने घर ले आया। यहीं से इस परिवार में नफरत का ऐसा दौर शुरू हुआ जो इस अंजाम तक पहुंचा।
आरोपी बेटे ने कबूला कि उसका पिता शराब का नशे में धुत होकर उसकी सगी मां सुनीता को उसके सामने मुर्गा बनाता था, उसे बेरहमी से पीटता था और घर के सारे काम करवाता था। बच्चों पर भी जुल्म ढाए जाते थे। मां का यह बेहिसाब दर्द देखकर बेटा अंदर ही अंदर प्रतिशोध की आग में सुलग रहा था। वह अपने पिता को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मान चुका था और इससे पहले भी वह अपने पिता को खाने में जहर देकर और माइंस की गहरी खाइयों में धक्का देकर मारने की असफल कोशिशें कर चुका था। बुधवार की रात को भी रामसिंह और सुरज्ञान ने घर पर शराब पार्टी की थी, जिसके बाद रामसिंह का पहली पत्नी सुनीता से भयंकर झगड़ा हुआ।
इसके बाद गुस्से के आवेश में आकर पहली पत्नी सुनीता, बेटी सरिता और नाबालिग बेटे ने मिलकर खौफनाक साजिश रची। नाबालिग बेटे ने इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन एक तेज धारदार चाकू ऑर्डर करके पहले ही मंगा रखा था। बुधवार की रात को जब पिता, सौतेली मां, दादी और मौसेरी बहन गहरी नींद में सो गए, तो बेटे ने दबे पांव कमरे में कदम रखा और सोते समय धारदार चाकू से पिता का गला रेत दिया। पिता को तड़पता देख पास सो रही सौतेली मां सुरज्ञान की आंख खुल गई। उसने शोर मचाने की कोशिश की, तो बेटे ने उसका भी गला काट दिया। चीख-पुकार सुनकर जब बुजुर्ग दादी पूसीदेवी और मौसेरी बहन महिमा उस कमरे की तरफ भागीं, तो नफरत में अंधे हो चुके बेटे ने अपनी सगी मां और बहन के साथ मिलकर उन दोनों को भी मौत के घाट उतार दिया। चंद मिनटों के भीतर पूरा कमरा खून से भर चुका था।
कत्ल के बाद सबूतों को मिटाने का खेल शुरू हुआ। मां, बेटी और बेटे ने मिलकर आंगन में खड़े ट्रैक्टर से डीजल निकाला। फिर चारों शवों को घसीटकर रामसिंह की ही एसयूवी गाड़ी के पिछले हिस्से में लाद दिया। बेटा खुद गाड़ी चलाकर घर से करीब 500 मीटर दूर सुनसान सड़क किनारे ले गया। वहां एसयूवी पर डीजल छिड़का गया और पिता की ही उसी माचिस की एक तीली से बेटे ने पूरी कार को आग के हवाले कर दिया। इसके बाद तीनों चुपचाप घर लौटे, रातभर साक्ष्य मिटाने के लिए दीवारों और फर्श से खून के धब्बे धोए, चाकू को कुएं में फेंककर छुपाया और सुबह होते ही घटनास्थल पर भी नहीं पहुंचे और घर पर ही बैठकर रोने और विलाप करने का ढोंग रचने लगे।
लेकिन कानून की पैनी नजरों से ये शातिर कातिल बच नहीं सके। अरांई और बोराड़ा पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए मुख्य आरोपी नाबालिग बेटे को डिटेन कर लिया है, जबकि उसकी सगी मां सुनीता और बहन सरिता को गिरफ्तार कर जेल की कालकोठरी में बंद कर दिया है। घरेलू कलह, जुल्म और प्रतिशोध की इस भयानक आग ने एक ही झटके में चार जिंदगियों को खत्म कर दिया और बाकी बचे तीन लोगों का भविष्य सलाखों के पीछे अंधकार में धकेल दिया। यह वारदात इस बात का सबसे खौफनाक उदाहरण है कि जब रिश्तों से बर्दाश्त और इंसानियत खत्म हो जाती है, तो घर का ही चिराग पूरे परिवार को खाक कर देता है।
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नमस्कार दोस्तों, कल रात से हमारे पूरे मोहल्ले में ऐसा भयंकर कोहराम मचा हुआ है कि पुलिस वाले भी हैरान हैं। खबर ही ऐसी है! हमारे सीधे-साधे, गोल-मटोल शर्मा जी ने वो कर दिखाया है जो बड़े-बड़े सूरमा नहीं कर पाए। खबर उड़ी है कि शर्मा जी की शादी रातों-रात सीधे हमारी ड्रामा क्वीन राखी सावंत से हो गई है! जी हां, सोशल मीडिया पर सुबह से एक फोटो वायरल हो रही है जिसमें शर्मा जी दूल्हे के सेहरे में हैं और बगल में लाल जोड़े में राखी सावंत खड़ी हैं।
यह खबर फैलते ही मोहल्ले के सारे कुंवारे लड़के सदमे में चले गए। जो लोग कल तक शर्मा जी को 'शर्मा अंकल' कहकर चिढ़ाते थे, वो सुबह ही से उनके घर के बाहर 'शर्मा जी जिंदाबाद' और 'भाभी जी जिंदाबाद' के नारे लगाने लगे। शर्मा जी के दोस्तों ने तो अपनी 'नागिन डांस' वाली पोशाक भी निकाल ली।
आज सुबह होते ही पूरा मोहल्ला हाथ में फूलों की माला और कैमरे लेकर शर्मा जी के घर के बाहर जमा हो गया। सब टकटकी लगाए बैठे थे कि कब हमारी नई सेलिब्रिटी भाभी जी यानी राखी सावंत बाहर आएंगी और मीडिया के सामने अपना कोई नया ड्रामा या डांस शुरू करेंगी। लोग सुबह की चाय छोड़-छोड़कर ठंडी हवा में खड़े सिर्फ एक झलक का इंतजार कर रहे थे।
तभी अचानक घर का मुख्य दरवाजा खुला और अंदर से हमारे शर्मा जी बाहर आए। लेकिन अजीब बात यह थी कि उनके चेहरे पर शादी वाली कोई चमक नहीं थी । लोगों ने उन्हें तुरंत घेर लिया और चिल्लाकर पूछा, "शर्मा जी, बधाई हो! लेकिन हमारी नई भाभी जी यानी राखी जी कहां हैं? उन्हें बाहर बुलाइए, हमें लाइव ड्रामा देखना है और सेल्फी लेनी है!"
शर्मा जी ने नल पर अपना मुंह धोते हुए भीड़ से धीरे से कहा, "अरे यार , थोड़ा धीरे बोलो! अगर अंदर तुम्हारी भाभी ने सुन लिया, तो वो झाड़ू छोड़ो, सीधे बेलन से मारेगी! काहे की शादी और कौन सी राखी सावंत!"
तभी भीड़ में से किसी ने उन्हें मोबाइल पर वो वायरल फोटो दिखाई। फोटो देखते ही शर्मा जी अपना सिर पीटते हुए हंसे और बोले, "अरे यार! ये तो किसी एआई का कमाल है। इस इंटरनेट के जमाने में ये एआई वाले पल भर में किसी की भी बारात निकलवा सकते हैं और किसी की भी घर में लंका लगवा सकते हैं! तुम लोग भी ऐआई की इस खुराफात के चक्कर में आ गए!"
तो दोस्तों, इस पूरी कहानी का सार यह है कि आज के डिजिटल समय में किसी भी फोटो या वीडियो पर आंख बंद करके विश्वास करने से पूर्व उसकी सत्यता की जांच अवश्य करें, क्योंकि वो पूरी तरह बनावटी और नकली हो सकता है।
तो प्यारे दोस्तों, अगर शर्मा जी की इस एआई वाली शादी और बेलन का डर आपको पसंद आया हो, तो बिना कंजूसी किए वीडियो को तुरंत लाइक ठोक दो! नीचे कमेंट में बताओ कि अगर कोई आपकी ऐसी एआई फोटो बनाता, तो आप अपनी दुल्हन कौन सी चुनते? वीडियो को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना बिल्कुल मत भूलना और ऐसे ही और मजेदार वीडियो देखने के लिए चैनल को अभी के अभी सब्सक्राइब भी कर लो। मिलते हैं अगले वीडियो में, तब तक के लिए टाटा, बाय-बाय!
नमस्कार, आप देख रहे हैं यक्ष न्यूज़। राजस्थान की सियासत और ग्रामीण इलाकों से जुड़ी इस वक्त की सबसे बड़ी और महा-ब्रेकिंग न्यूज़ सामने आ रही है। राजस्थान में पिछले डेढ़ साल से अटके पड़े सरपंच, पंचायत और नगर निकाय चुनावों को लेकर अब दिल्ली से लेकर जयपुर तक हड़कंप मच गया है। लंबे समय से कानूनी दांवपेच में उलझा यह बड़ा मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है। हाई कोर्ट से तगड़ा झटका खाने के बाद जहां एक तरफ भजनलाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग बैकफुट पर हैं, वहीं दूसरी तरफ याचिकाकर्ता और पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल करके सरकार की घेराबंदी पूरी तरह से मजबूत कर दी है।
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अब बात करते हैं आज की सबसे बड़ी कानूनी हलचल की। पूर्व विधायक और मुख्य याचिकाकर्ता संयम लोढ़ा ने सुप्रीम कोर्ट में एक कैविएट दाखिल की है। इस कैविएट याचिका का सीधा और आसान मतलब यह है कि यदि राजस्थान सरकार या राज्य चुनाव आयोग हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाते हैं और चुनाव टालने के लिए स्टे ऑर्डर लाने की कोशिश करते हैं, तो देश की सबसे बड़ी अदालत बिना संयम लोढ़ा का पक्ष सुने कोई भी एकतरफा फैसला या राहत सरकार को नहीं दे पाएगी।
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दरअसल, राजस्थान हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने साफ शब्दों में आदेश दिया था कि आगामी इकतीस जुलाई तक राज्य में हर हाल में पंचायत और निकाय चुनाव संपन्न कराए जाएं। कोर्ट ने इसके लिए ओबीसी कमीशन को भी निर्देश दिए हैं कि वे बीस जून तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपें। हाई कोर्ट के इसी कड़े रुख के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज थी कि सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर चुनाव को साल के अंत यानी दिसंबर तक टालने की कोशिश कर सकती है। लेकिन संयम लोढ़ा की इस कैविएट ने सरकार की राह में बड़ा कानूनी रोड़ा अटका दिया है।
इस मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने चुनाव टालने के लिए बहानों की झड़ी लगा दी थी। सरकार का कहना था कि राजस्थान में इस समय भीषण गर्मी पड़ रही है और इसके बाद मानसून यानी भारी बारिश का दौर शुरू हो जाएगा, इसलिए चुनाव कराना संभव नहीं है। इसके अलावा सरकार ने सुरक्षाकर्मियों और स्टाफ की कमी का भी हवाला दिया था। लेकिन हाई कोर्ट के जजों ने सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि राजस्थान में गर्मी और बारिश जैसे बहाने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को रोकने के लिए मान्य नहीं हो सकते। जब मौसम की वजह से सरकारी अधिकारियों और दफ्तरों का काम नहीं रुकता, तो फिर जनता के लोकतांत्रिक अधिकार यानी चुनाव को क्यों रोका जाए? चुनाव कराना सरकार का संवैधानिक और अनिवार्य कर्तव्य है, जिसे टाला नहीं जा सकता।
वैसे आपके इलाके में सरपंच चुनाव को लेकर इस वक्त क्या माहौल है? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपने गांव या शहर का नाम लिखकर जरूर बताएं।
इस पूरी खबर में एक और सनसनीखेज मोड़ तब आया जब राज्य चुनाव आयोग ने खुद को कोर्ट की अवमानना से बचाने के लिए पूरा ठीकरा राज्य सरकार के सिर पर फोड़ दिया। दरअसल, हाई कोर्ट ने पहले इन चुनावों को पंद्रह अप्रैल तक कराने का आदेश दिया था, लेकिन वो समयसीमा निकल गई, जिसके बाद संयम लोढ़ा ने कोर्ट में अवमानना की याचिका दायर की थी। इस पर जवाब देते हुए राज्य चुनाव आयोग ने हाई कोर्ट में बिना शर्त माफी मांगी और साफ-साफ कहा कि चुनाव में देरी के लिए वो जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि राजस्थान सरकार जिम्मेदार है। चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि सरकार ने समय पर वार्डों का परिसीमन नहीं किया और न ही आरक्षण का अनिवार्य डेटा समय पर उपलब्ध कराया। जब तक सरकार सीमाएं तय करके फाइनल लिस्ट नहीं देगी, तब तक चुनाव आयोग अपने स्तर पर चुनाव की प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकता। चुनाव आयोग के इस बयान ने कोर्ट में सरकार को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है।
तो कुल मिलाकर स्थिति अब यह है कि राजस्थान में गांव की सरकार और शहरों के वार्ड पार्षदों के चुनाव को लेकर कानूनी लड़ाई अपने चरम पर पहुंच गई है। एक तरफ जहां हाई कोर्ट के डंडे के बाद चुनाव आयोग और प्रशासन पर इकतीस जुलाई तक चुनाव कराने का भारी दबाव है, वहीं सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल होने के बाद अब सरकार के पास आसानी से स्टे लाने का रास्ता भी बंद हो चुका है। ऐसे में अब कभी भी राजस्थान में चुनावी बिगुल बज सकता है और गांवों से लेकर शहरों तक सियासी सरगर्मियां तेज हो सकती हैं। अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्या रुख अपनाता है।
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भाइयों और बहनों, आज 'यक्ष न्यूज़' पर एक ऐसा चुनावी घमासान और महा-ट्विस्ट आने वाला है, जिसे सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे! आज आप देखेंगे कि कैसे रात तक दूसरों की साइकिलों के पंक्चर साटने वाला एक मामूली सा लड़का, सुबह होते ही सीधा 'राजपाल यादव से मुकेश अंबानी' बनकर सफेद स्कॉर्पियो में गांव रौंदने निकलता है। लेकिन कहानी में असली भूचाल तब आता है, जब घमंड में चूर इस नए नवेले नेता को धूल चटाने के लिए भीलवाड़ा के मशहूर शर्मा जी अपने चमचमाते काले घोड़े पर सवार होकर सीधे चुनावी मैदान में उतर जाते हैं!
पूरे गांव में ऐसा भौकाल मचता है कि बड़े-बड़े सूरमाओं का 'गेम बज' जाता है। लेकिन रुकिए! असली खेल तो तब पलटता है जब वोटों की गिनती के आखिरी राउंड में सिर्फ एक वोट बचता है, और वो आखिरी वोट किसी और का नहीं बल्कि शर्मा जी के सबसे बड़े जानी-दुश्मन का होता है! क्या वो आखिरी वोट शर्मा जी की किस्मत बदलेगा या राजू बाजी मार ले जाएगा? और कहानी के अंत में जो महा-ट्विस्ट छिपा है, उसे देखकर आप अपनी हंसी रोक नहीं पाएंगे। अगर इस मजेदार चुनावी दंगल का असली मजा लेना है, तो वीडियो को बिल्कुल भी छोड़ना मत, आखिर तक बने रहिए क्योंकि आज शर्मा जी सबका खेल करने वाले हैं!
भीलवाड़ा वाले शर्मा जी को तो आप जानते ही हैं, वही जो अपनी नई कार का पेट्रोल बिल देखकर ऐसे टूटीबा हुए कि उनकी आत्मा सीधे शरीर छोड़कर पेट्रोल पंप के बोर्ड पर जा बैठी थी! फिर बड़ी मुश्किल से उस आत्मा को वापस पेट्रोल सुंघाकर शरीर में खींचा गया, बस उसी शाम वो कार छोड़कर काला घोड़ा खरीद लाए थे।
सब कुछ बढ़िया चल रहा था, लेकिन एक दिन शर्मा जी अपने घोड़े पर बैठकर आराम से चौराहे पर खड़े थे। तभी अचानक धूल उड़ती है, हूटर बजता है और सामने से चमचमाती हुई सफेद रंग की स्कॉर्पियो आकर रुकती है। गाड़ी का शीशा धीरे-धीरे नीचे उतरता है और अंदर से निकलता है—राजू! वही राजू जो पांच साल पहले तक चौराहे पर बैठ कर लोगों की साइकिल का पंक्चर साटने का काम करता था और थड़ी पर चाय पीने के लिए शर्मा जी से पांच-पांच रुपये उधार मांगा करता था, आज सरपंच बनते ही घमंड में अंधा होकर कुर्ते की कॉलर खड़ी करके राजपाल यादव से सीधा मुकेश अंबानी बन गया था।
उसने शर्मा जी को देखा, अपना काला चश्मा थोड़ा नीचे उतारा और बड़े एटीट्यूड में तंज कसते हुए बोला, "और शर्मा! क्या हाल-चाल? कहां घोड़े की सवारी में जिंदगी का कीमती समय बर्बाद कर रहे हो? थोड़ा जिंदगी का मज़ा लो जिंदगी का!"
राजू के मुंह से अपने लिए 'शर्मा जी' की जगह सिर्फ 'शर्मा' सुनकर शर्मा जी को ऐसा लगा जैसे किसी ने चलती हुई कड़ाके की ठंड में सीधे मफलर के अंदर बर्फ का गोला डाल दिया हो या फिर रसगुल्ला समझकर किसी ने धोखे से गुलाब जामुन की जगह तीखा मिर्ची का भजिया मुंह में ठूस दिया हो!
शर्मा जी ने मन ही मन सोचा—"शर्मा जी से सीधे शर्मा? बेटा, तेरा गेम बजाना ही पड़ेगा!"
शर्मा जी अपने घोड़े पर बैठे-बैठे सोचने लगे कि देश में सरपंच तो हर पांच साल में बनते हैं और करोड़ों का सरकारी फंड भी आता है, मगर कुछ सरपंच इस राजू जैसे होते हैं। गांव की जनता आज भी टूटी सड़कों पर धूल फांक रही है! इसका मतलब साफ है भाई साहब! कुछ लोग सरपंच का चुनाव सिर्फ इसलिए लड़ना चाहते हैं ताकि जनता को भले ही सरकारी नल का दो बूंद पानी न मिले, लेकिन सरकारी पैसे की पूरी गंगा बहती हुई सीधे इनकी खुद की तिजोरी में समा जाए! सरपंच बनते ही इन स्वार्थी नेताओं के पास वो दिव्य चश्मा आ जाता है जिससे इन्हें गांव की टूटी सड़कें... और बहती हुई नालियां तो बिल्कुल दिखना बंद हो जाती हैं, लेकिन सरकारी बजट का रास्ता सीधे अपने बैंक अकाउंट की तरफ जाता हुआ एकदम साफ-साफ दिखाई देने लगता है।
बस, फिर क्या था! राजू जैसे घमंडी और अहंकारी उम्मीदवारों को धूल चटाने के लिए और गांव की किस्मत बदलने के लिए शर्मा जी ने ऑन द स्पॉट फैसला कर लिया और अपने घोड़े को सीधे पंचायत भवन की तरफ दौड़ा दिया सरपंच का पर्चा भरने के लिए!
पर्चा भरते ही चुनावी मैदान में जो भौकाल मचा, भाई साहब पूछो ही मत! गांव का माहौल एकदम मजेदार और टनाटन हो गया। दीवारों पर चूने से लिखा जा रहा था—"खिड़की में से झांक रहा है राजू, इस बार खाएगा वो गाजर और काजू!" तो दूसरी तरफ लादूलाल टेंट हाउस वाले के चमचे लाउडस्पीकर पर चिल्ला रहे थे—"कचौड़ी-जलेबी खाएंगे, लादूलाल को लाएंगे!" चुनावी रैलियों में ऐसे-ऐसे नारे लग रहे थे कि जनता लोटपोट हो रही थी। एक तरफ राजू के भाड़े के लड़के चिल्लाते—"राजू भाई का जलवा है, बाकी सब तो हलवा है!" तो जवाब में शर्मा जी के समर्थक ढोल की थाप पर हुंकार भरते—"नो पेट्रोल, नो तेल, शर्मा जी करेंगे सबका खेल! काले घोड़े की ऐसी रफ्तार, राजू-लादू अबकी बार बेकार!"
चुनावी मैदान का यह रंग देखकर शर्मा जी ने चौपाल पर खड़े होकर जोर से ताली बजाई और बोले, "ओ रे गांव के प्रतापी वोटरों! चुनाव के दिनों में ये नेता तुम्हारे कदमों में आकर साष्टांग दंडवत प्रणाम करते हैं, लेकिन जैसे ही तुम पांच सौ के नोट और एक पव्वे के लालच में अपना कीमती वोट बेच देते हो, तो पासा ऐसा पलटता है कि अगले पांच साल तक पूरी जनता इन नेताओं के कदमों में नाक रगड़ती नजर आती है! पांच साल का सारा गुस्सा सिर्फ एक प्लेट मुफ्त की कचौड़ी-जलेबी, एक कुल्हड़ चाय और रात के एक पव्वे के आगे घुटने टेक देता है। वोटर सोचता है कि पांच साल बाद विकास होगा या नहीं, इसका क्या भरोसा? जो मिल रहा है वो आज रात को ही पेट के अंदर कर लो। एक अंकल तो कचौड़ी और पव्वे के लालच में इतने भावुक हो गए कि अपनी तीन पीढ़ियों का वोट लादूलाल के नाम एडवांस में बुक कर आए और बोले कि नेता हो तो लादूलाल जैसा, जो सुबह नाश्ते का और रात को व्यवस्था का इंतजाम तो कर देता है, भले ही बाद में पांच साल तक पूरे गांव के पेट में मरोड़े उठते रहें।"
तभी भीड़ में से एक समझदार नौजवान ने चिल्लाकर पूछा, "शर्मा जी, अगर लोग लालच में नहीं आते, तो क्या विकास देखकर वोट देते हैं?"
इस पर शर्मा जी जोर से हंसे, इतना हंसे कि उनका काला घोड़ा भी पीछे मुड़कर देखने लगा। शर्मा जी बोले, "अरे ! जब कुछ लोग चुनाव में खड़े होते हैं, तो वो विकास के नाम पर नहीं, बल्कि सीधे जाति और बिरादरी के नाम पर वोट मांगते हैं। और कुछ वोटर भी पोलिंग बूथ के अंदर जाते ही स्कूल, hospital और रोजगार के बारे में नहीं सोचते। वो सिर्फ यह देखता है कि कैंडिडेट का सरनेम उसकी खुद की जाति से मैच खा रहा है या नहीं। सामने वाला कैंडिडेट भले ही कतई अंगूठा छाप और महा-दोगला हो, जिसने जिंदगी में कभी स्कूल का मुंह न देखा हो, लेकिन अगर वो अपनी बिरादरी का है, तो वोटर बड़े गर्व से छाती चौड़ी करके बटन दबाता है और बाहर आकर कहता है कि भले ही नाली का पानी हमारे घर के बेड तक घुस जाए, लेकिन सरपंच तो हमारी ही जात का होना चाहिए! अरे, जब तक जात-पात और इस दोगलेपन पर वोट दोगे, तब तक सही सरपंच कैसे मिलेगा?"
शर्मा जी की इस खरी-खरी बात ने गांव वालों की आंखें खोल दीं। धीरे-धीरे चुनाव का दिन भी आ गया और वोटिंग शुरू हो गई। इस बार जनता पव्वे, कचौड़ी, नारों के शोर और जाति के चश्मे से बाहर निकलकर वोट कर रही थी। देखते ही देखते वोटों की गिनती का दिन भी आ गया।
माहौल एकदम कड़ाके का था। मुकाबला त्रिकोणीय था—शर्मा जी, लादूलाल और राजू। राउंड दर राउंड गिनती आगे बढ़ी। जब आखिरी राउंड की गिनती बची, तो पूरा मैदान सांस रोककर खड़ा था। राजू का तो पहले ही 'गेम बज' चुका था और वह रेस से करारी शिकस्त खाकर बाहर हो गया था। अब शर्मा जी और लादूलाल के वोट बिल्कुल बराबर-बराबर चल रहे थे। तभी पता चला कि पूरे गांव में सिर्फ एक वोट बाकी रह गया है, और वो आखिरी वोट किसी और का नहीं बल्कि खुद उनके सबसे बड़े विरोधी लादूलाल टेंट हाउस वाले का था!
लादूलाल पोलिंग बूथ के अंदर गए। पूरा गांव सोच रहा था कि लादूलाल तो खुद को ही वोट देंगे और मैच टाई हो जाएगा। लेकिन जैसे ही लादूलाल बाहर आए, उन्होंने सीधे माइक हाथ में लिया और भरी चौपाल पर बोले, "भाइयों और बहनों! आज मैंने खुद को नहीं, बल्कि घोड़े वाले शर्मा जी को वोट दिया है!"
यह सुनते ही पूरा गांव सन्न रह गया। राजू का तो मुंह ही खुला रह गया। लादूलाल ने शर्मा जी के गले में माला डाली और बोले, "ना जात पर, ना पात पर, ना नोट पर, ना पव्वे पर! वोट अब पड़ेगा सिर्फ उस पर जो सच में विकास करवा सके, ना कि उस पर जो भ्रष्टाचार करके अपनी तिजोरी भरे। शर्मा जी ने हमारी आंखें खोल दी हैं। सरपंच वही बनना चाहिए जो सेवा कर सके, धंधा नहीं।"
चुनाव अधिकारी ने तुरंत घोषणा की—"शर्मा जी भारी बहुमत से सरपंच का चुनाव जीत गए हैं!"
पूरे मैदान में ढोल-नगाड़े बजने लगे। जनता झूम उठी। शर्मा जी के काले घोड़े के गले में फूलों की माला डाल दी गई और शर्मा जी को कंधे पर उठाकर लोग नारे लगाने लगे—"सरपंच हो तो शर्मा जी जैसा!" शर्मा जी गर्व से मूंछों पर ताव दे रहे थे ।
तभी अचानक हवा में एक ज़ोरदार गूंज उठी। आसमान से फूल बरसने ही वाले थे कि किसी ने पीछे से शर्मा जी का कुर्ता ज़ोर से खींचा और चिल्लाया—"अरे ओ सेठ जी! उठो! बहुत देर से घोड़े पर सो रहे हो... चाय की थड़ी का दो दिन का पैसा बाकी है...पैसा दे दो!"
शर्मा जी की अचानक आंख खुली।
सामने ना कोई ढोल-नगाड़े थे, ना लादूलाल की माला थी और ना ही सरपंच की कुर्सी। सामने सिर्फ चाय की थड़ी वाला खड़ा था और उनका काला घोड़ा चुपचाप बाजू में खड़ा घास चबा रहा था। शर्मा जी ने एक लंबी सांस ली, जेब से पैसे निकाले और उदास होकर बोले—"अरे यार... कम से कम सपने में ही सही, वो सफेद स्कॉर्पियो तो दरवाजे पर लाने देते!"
तो भाइयों और बहनों! कैसी लगी भीलवाड़ा वाले शर्मा जी की यह धमाकेदार और मजेदार चुनावी कहानी? अगर आपको भी शर्मा जी का यह करारा जवाब और राजू का 'राजपाल यादव से मुकेश अंबानी' बनने का सफर पसंद आया हो, तो बिना किसी उधारी और कुंजी के हमारे चैनल 'यक्ष न्यूज़' को अभी के अभी सब्सक्राइब कर लीजिए!
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नमस्कार, आप देख रहे हैं यक्ष न्यूज़। आज हम आपको एक ऐसी सच्ची घटना की तह में ले जाने वाले हैं, जिसकी शुरुआत एक खौफनाक चीख से हुई थी और जिसका अंत एक ऐसे सनसनीखेज खुलासे के साथ हुआ जिसने पूरे देश के होश उड़ा दिए। यह कहानी मध्य प्रदेश के धार जिले की है, जहां एक हंसता-खेलता परिवार अचानक आधी रात को एक खूनी खेल का गवाह बन जाता है। तारीख थी अप्रैल दो हजार छब्बीस की एक घनेरी रात। चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था कि अचानक एक घर से रोने और चीखने की आवाजें आने लगती हैं। आस-पड़ोस के लोग दौड़कर वहां पहुंचते हैं तो देखते हैं कि घर का मालिक देवकृष्ण पुरोहित लहूलुहान हालत में जमीन पर पड़ा हुआ है और उसकी सांसें थम चुकी हैं। वहीं पास में उसकी पत्नी प्रियंका पुरोहित बदहवास हालत में बैठी फूट-फूटकर रो रही थी। उसका रोना ऐसा था कि देखने वाले हर शख्स का कलेजा कांप उठा। चारों तरफ मातम छा गया और तुरंत इस खौफनाक वारदात की खबर स्थानीय पुलिस को दी गई। पुलिस की गाड़ियां सायरन बजाती हुई मौके पर पहुंचती हैं और पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो जाता है।
पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर देवकृष्ण पुरोहित का दुश्मन कौन था और इतनी बेरहमी से उसकी जान क्यों ली गई। कैमरे के सामने आकर रोते हुए प्रियंका पुरोहित ने जो बयान दिया, उसने पुलिस के भी रोंगटे खड़े कर दिए। प्रियंका ने कांपती आवाज में बताया कि आधी रात को कुछ अज्ञात हथियारबंद बदमाश और खूंखार लुटेरे दीवार फांदकर उनके घर में दाखिल हुए थे। प्रियंका ने दावा किया कि बदमाशों ने आते ही सबसे पहले उसका मुंह दबा दिया ताकि वह शोर न मचा सके, और फिर उसे घसीटते हुए कमरे के कोने में फेंक दिया। उसने रोते हुए बताया कि लुटेरे अलमारियों को खंगाल रहे थे और जब उसके पति देवकृष्ण ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो बेरहम बदमाशों ने उन पर जानलेवा हमला कर दिया। प्रियंका ने रोते हुए कैमरे पर कहा कि उसने बदमाशों के सामने अपने हाथ जोड़े थे, पैर पकड़े थे और मिन्नतें की थीं कि जो कुछ भी घर में है सब ले जाओ लेकिन मेरे सुहाग को छोड़ दो, पर उन जालिमों को जरा भी तरस नहीं आया। प्रियंका का यह रोता हुआ वीडियो इंटरनेट पर आग की तरह फैल गया और पूरे इलाके में दहशत का माहौल बन गया कि अब लोग अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।
धार जिले की पुलिस के लिए यह मामला एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका था। पुलिस कप्तान ने मामले की गंभीरता को देखते हुए फौरन एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन किया। फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स और खोजी कुत्तों की मदद से घटनास्थल का कोना-कोना छाना गया। लेकिन जैसे-जैसे पुलिस इस मामले की गहराई में उतर रही थी, कहानी में सस्पेंस गहराता जा रहा था। पुलिस के जासूसों को कुछ बातें हजम नहीं हो रही थीं। सबसे अजीब बात यह थी कि अगर लुटेरे घर में डकैती के इरादे से घुसे थे, तो घर की कीमती अलमारियों में रखा कैश और जेवर पूरी तरह सुरक्षित कैसे बच गए। लुटेरे सिर्फ एक हत्या करके इतनी आसानी से क्यों भाग गए। दूसरी बात यह कि खोजी कुत्तों को घर के बाहर किसी अनजान शख्स के भागने के कोई निशान नहीं मिल रहे थे। तफ्तीश आगे बढ़ी तो पुलिस का माथा ठनका और उन्हें महसूस हुआ कि जो कहानी सामने दिख रही है, असली हकीकत उससे कोसों दूर कहीं छिपी हुई है। पुलिस ने अब अपनी जांच का रुख बदला और इस सस्पेंस मिस्ट्री को सुलझाने के लिए डिजिटल फुटप्रिंट्स का सहारा लेने का फैसला किया।
जांच अधिकारियों ने बिना देर किए मृत देवकृष्ण और उनकी पत्नी प्रियंका के मोबाइल फोन को अपने कब्जे में लिया और साइबर सेल को सौंप दिया। यहीं से इस पूरी कहानी में एक ऐसा मोड़ आया जिसने पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसका दी। साइबर एक्सपर्ट्स ने जब प्रियंका पुरोहित के सोशल मीडिया अकाउंट्स और फोन के कॉल रिकॉर्ड्स को खंगालना शुरू किया, तो परदे के पीछे चल रहा एक बेहद गंदा और खौफनाक खेल सामने आने लगा। पता चला कि प्रियंका को इंस्टाग्राम पर रील्स बनाने का बहुत शौक था और इसी आभासी दुनिया में उसकी मुलाकात एक अनजान शख्स से हुई थी। धीरे-धीरे वह शख्स प्रियंका का प्रेमी बन चुका था और दोनों के बीच घंटों बातें होती थीं। सस्पेंस से पर्दा तब उठा जब पुलिस ने देखा कि वारदात वाली रात भी, घटना से ठीक कुछ देर पहले प्रियंका के फोन से उसी नंबर पर कई बार बातचीत की गई थी। अब पुलिस का शक पूरी तरह यकीन में बदल चुका था कि घर के अंदर कोई बाहरी लुटेरा नहीं आया था, बल्कि असली कातिल तो घर के भीतर ही मौजूद था।
पुलिस ने बिना वक्त गंवाए प्रियंका पुरोहित को हिरासत में ले लिया और उसे थाने के इंटरोगेशन रूम में ले आया गया। शुरुआत में प्रियंका ने अपने आंसू बहाकर पुलिस को गुमराह करने की आखिरी कोशिश की और खुद को बेकसूर बताती रही। लेकिन पुलिस के शातिर अधिकारियों ने जब टेबल पर प्रियंका के फोन की कॉल डिटेल्स, लोकेशन की टाइमिंग और उसके प्रेमी के साथ हुई चैट्स के स्क्रीनशॉट्स लाकर रख दिए, तो प्रियंका का सारा सस्पेंस और ड्रामा पल भर में बिखर गया। वह समझ गई कि अब उसका बचना नामुमकिन है। प्रियंका ने अपना सिर झुका लिया और रोते हुए उस खौफनाक सच को कबूल किया जिसे सुनकर थाने में मौजूद हर पुलिसकर्मी दंग रह गया। प्रियंका ने माना कि डकैती और लूट की पूरी कहानी मनगढ़ंत थी। असलियत यह थी कि वह अपने इस प्रेमी के प्यार में पूरी तरह अंधी हो चुकी थी और उसका पति देवकृष्ण उनके इस अवैध रिश्ते के बीच का सबसे बड़ा रोड़ा था। प्रियंका ने कबूल किया कि उसने खुद अपने प्रेमी को उस रात घर बुलाया था और दोनों ने मिलकर सोते हुए देवकृष्ण की बेरहमी से हत्या कर दी थी, ताकि वे हमेशा के लिए एक दूजे के हो सकें।
प्रियंका के इस चौंकाने वाले कबूलनामे के बाद पुलिस ने तुरंत छापेमारी कर उसके प्रेमी को भी गिरफ्तार कर लिया। दोनों सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं और अदालत में उनके खिलाफ सख्त कानूनी शिकंजा कस दिया गया है। जिस पत्नी को देवकृष्ण अपनी दुनिया मानता था, उसी ने सोशल मीडिया और अवैध संबंधों की खातिर उसका जीवन खत्म कर दिया। इस रूह कंपा देने वाली वास्तविक घटना ने साबित कर दिया है कि कभी-कभी सबसे करीबी चेहरा ही सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। इस पूरी सस्पेंस मिस्ट्री और खौफनाक वारदात पर आपकी क्या राय है, इस बेवफा पत्नी को क्या सजा मिलनी चाहिए, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय लिखकर जरूर बताएं। अगर आपको हमारी यह खोजी रिपोर्ट पसंद आई हो, तो इस वीडियो को लाइक करें, ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और हमारे चैनल यक्ष न्यूज़ को अभी सब्सक्राइब करें ताकि ऐसी ही सनसनीखेज और सच्ची खबरें सबसे पहले आप तक पहुंचती रहें। बेल आइकन दबाना बिल्कुल न भूलें। देश और दुनिया की तमाम बड़ी खबरों को लगातार देखने के लिए जुड़े रहिए यक्ष न्यूज़ के साथ। नमस्कार।
नमस्कार, यक्ष न्यूज़ में आपका स्वागत है। राजस्थान के गांव-गांव की सरकार और निकाय चुनावों को लेकर इस वक्त की सबसे बड़ी, बेहद महत्वपूर्ण और धमाकेदार खबर सामने आ रही है। अगर आप भी राजस्थान में सरपंच और नगर निकाय के चुनावों की तारीखों का इंतजार कर रहे हैं, तो आपके लिए बहुत बड़ी और बिल्कुल ताजा अपडेट आ चुकी है। राजस्थान हाई कोर्ट की नई डेडलाइन सामने आने के बाद अब सूबे की भजनलाल सरकार ने भी चुनावी मैदान में उतरने का पूरी तरह से मन बना लिया है और सरकार के सबसे सीनियर मंत्रियों में से एक का बड़ा आधिकारिक बयान जारी हो गया है। प्रदेश के नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन यानी यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने मीडिया से बातचीत करते हुए साफ कर दिया है कि राज्य सरकार चुनाव कराने के लिए पूरी तरह से तैयार है। मंत्री ने दो टूक शब्दों में कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग जब भी उचित समझे और चुनाव की तारीखों का ऐलान करे, सरकार उन्हें हर तरह की सहायता और मैनपावर देने के लिए तत्काल उपलब्ध है।
मंत्री झाबर सिंह खर्रा के इस बयान ने राजस्थान की सियासत में चल रही कई तरह की अटकलों पर पूरी तरह से विराम लगा दिया है। सरकार के स्तर पर चल रही तैयारियों का पूरा ब्यौरा देते हुए यूडीएच मंत्री ने बताया कि सरकार ने अपने हिस्से का काम लगभग तीन महीने पहले ही पूरा कर लिया था। इसमें पंचायती राज और पंचायत समितियों का पुनर्गठन, नई पंचायतों का सृजन, वार्डों का नए सिरे से परिसीमन और शहरी निकायों के सीमा विस्तार का सारा काम पूरी तरह कंप्लीट है। सरकार के पास अपनी तरफ से कोई भी काम पेंडिंग नहीं है। लेकिन इसके साथ ही मंत्री ने उस असली वजह का भी खुलासा किया जिसके कारण अब तक चुनाव अटके हुए थे और जिसके चलते सरकार ने कोर्ट से दिसंबर तक का समय मांगा था। मंत्री ने साफ किया कि चुनावों में सबसे बड़ा रोड़ा अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी आयोग के सटीक आंकड़ों का न मिल पाना है।
मंत्री ने इस पूरे विवाद का ठीकरा पिछली कांग्रेस सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि पूर्ववर्ती सरकार के समय ओबीसी आयोग का गठन ही नहीं किया गया था। जब भाजपा सरकार सत्ता में आई तो तुरंत आयोग का गठन किया गया, लेकिन उस समय सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी दूसरे जरूरी प्रशासनिक कामों और जनगणना के कार्य में लगी होने के कारण मैनपावर की भारी कमी हो गई। इसी वजह से पिछड़ा वर्ग आयोग को जिलों से ओबीसी जनसंख्या के सटीक और प्रामाणिक आंकड़े मिलने में दिक्कत आ रही है। मंत्री ने यह भी बताया कि आयोग का मानना है कि प्रशासन से ओबीसी के सटीक आंकड़े जुटाने में अभी कम से कम एक से डेढ़ महीने का समय और लग सकता है, और आंकड़े मिलने के बाद भी उनकी बारीकी से जांच करने में सात से दस दिन का वक्त लगेगा। इसके बाद ही आगे का कोई फैसला हो पाएगा।
इस पूरे मामले पर विपक्ष को घेरते हुए यूडीएच मंत्री ने एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने कहा कि जब विधानसभा सत्र के दौरान बिना ओबीसी रिपोर्ट के ही चुनाव कराने की बात आई, तो उन्होंने खुद विपक्षी सदस्यों से लिखित में मांग मांगी थी कि अगर वे चाहते हैं कि ओबीसी वर्ग को राजनीतिक आरक्षण दिए बिना ही चुनाव करवा दिए जाएं, तो वे ऐसा लिखकर दें। लेकिन आज तक विपक्ष के किसी भी नेता ने ऐसी मांग लिखित में नहीं सौंपी। ऐसे में सरकार ओबीसी वर्ग के अधिकारों के साथ समझौता किए बिना, राज्य निर्वाचन आयोग के जरिए विधिक राय यानी कानूनी सलाह लेकर आगे का फैसला करेगी।
आपको याद दिला दें कि राजस्थान हाई कोर्ट की डबल बेंच ने हाल ही में बाईस मई को राज्य सरकार की दिसंबर तक चुनाव टालने की अर्जी को खारिज करते हुए आगामी इकतीस जुलाई तक चुनाव संपन्न कराने के कड़े निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने ओबीसी आयोग को भी बीस जून तक हर हाल में अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा है। अब हाई कोर्ट की इस सख्त डेडलाइन और यूडीएच मंत्री झाबर सिंह खर्रा के इस ताजा बयान के बाद राज्य निर्वाचन आयोग पर पूरी जिम्मेदारी आ गई है। उम्मीद जताई जा रही है कि विधिक राय लेने के बाद अगले कुछ ही दिनों में चुनाव का पूरा खाका तैयार हो जाएगा। राजस्थान के इस महामुकाबले और सरपंच चुनाव की हर पल की लाइव अपडेट के लिए आप लगातार बने रहिए यक्ष न्यूज़ के साथ, धन्यवाद।
नमस्कार…
सुबह की शुरुआत करते हैं देश-दुनिया की बड़ी खबरों के साथ।
सबसे पहले पाकिस्तान से बड़ी खबर…
पाकिस्तान में एक बार फिर जाफर एक्सप्रेस ट्रेन सुसाइड अटैक का शिकार हुई है। धमाके के बाद पूरी बोगी जलकर राख हो गई। इस दर्दनाक हादसे में 23 लोगों की मौत हो गई जबकि 53 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। पूरे इलाके में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है।
अब बात अमेरिका और भारत से जुड़ी बड़ी खबर की…
भारतीयों पर नस्लीय टिप्पणियों के विवाद के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि “दुनिया के हर देश में मूर्ख लोग होते हैं।” उन्होंने वीजा बदलाव को लेकर भी सफाई दी और कहा कि भारत-अमेरिका संबंध मजबूत बने रहेंगे।
उधर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा किया है। ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ शांति समझौता लगभग तय है और होर्मुज स्ट्रेट जल्द खुल सकता है। उन्होंने कहा कि इसकी आधिकारिक घोषणा जल्द की जाएगी।
पश्चिम बंगाल से चुनावी खबर…
फाल्टा विधानसभा सीट पर बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की है। बीजेपी उम्मीदवार देबांगशु पांडा ने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की। वहीं हार के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गंभीर आरोप लगाए हैं और कहा है कि लोग डर के माहौल में वोटिंग कर रहे हैं।
एक लाइव कार्यक्रम के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बड़ी बात कही। ट्रंप बोले — “मैं पीएम मोदी का बहुत बड़ा फैन हूँ और भारत मुझ पर सौ प्रतिशत भरोसा कर सकता है।”
विदेश नीति पर भारत का सख्त संदेश…
रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दो टूक कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेता रहेगा और रूसी तेल खरीद जारी रहेगी।
देश की राजनीति में बयानबाजी भी तेज हो गई है।
राहुल गांधी ने दावा किया कि एक साल के भीतर मोदी सरकार की विदाई तय है। वहीं बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा कि मोदी सरकार गिराने के सपने देखना टूलकिट गैंग की पुरानी आदत है।
मनोरंजन जगत से दुखद खबर…
एक्ट्रेस ट्विशा का मौत के 12 दिन बाद अंतिम संस्कार किया गया। भोपाल में उनके भाई ने मुखाग्नि दी। मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली AIIMS की टीम ने दोबारा पोस्टमॉर्टम किया है।
बंगाल में अवैध घुसपैठ पर सरकार सख्त…
हर जिले में होल्डिंग सेंटर बनाए जाएंगे जहां संदिग्ध विदेशियों को 30 दिन तक रखा जाएगा। जांच पूरी होने के बाद उन्हें बीएसएफ को सौंपा जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के बडगाम से दिल दहला देने वाली खबर…
12 साल की लापता बच्ची का शव घर से मात्र 200 मीटर दूर मिला। पुलिस के अनुसार बच्ची के साथ रेप के बाद हत्या की गई है। पूरे इलाके में आक्रोश का माहौल है।
अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच ब्रिटेन ने होर्मुज स्ट्रेट से माइंस हटाने की तैयारी शुरू कर दी है। फ्रांस भी सहयोग देगा, हालांकि दोनों देशों ने शांति समझौते का इंतजार करने की बात कही है।
अब बात मौसम की…
आज से नौतपा शुरू हो चुका है। कई राज्यों में तापमान 46 डिग्री के पार पहुंच गया है। मौसम विभाग के अनुसार शुक्रवार तक राहत की उम्मीद नहीं है। उत्तर प्रदेश में लू और आंधी दोनों का असर देखने को मिल सकता है।
कर्नाटक की राजनीति में भी हलचल तेज है।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को दिल्ली बुलाया गया है जिसके बाद सीएम बदलने की अटकलें और तेज हो गई हैं।
आज अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो आगरा और जयपुर दौरे पर रहेंगे। उनके दौरे को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
अब खेल जगत की खबरें…
आईपीएल 2026 में राजस्थान रॉयल्स ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्लेऑफ के लिए क्वालीफाई कर लिया है। राजस्थान ने मुंबई इंडियंस को 30 रन से हराया।
वहीं दिल्ली कैपिटल्स ने कोलकाता नाइट राइडर्स को 40 रन से मात दी। केएल राहुल ने शानदार पारी खेलकर टीम को जीत दिलाई।
फिलहाल इतना ही…
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आपका दिन शुभ और मंगलमय हो। सुप्रभात।
भारतीय जनता पार्टी के पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाभियान 2026 के दूसरे दिन की शुरुआत बेहद ऊर्जावान रही। प्रातःकाल की शुरुआत योग, प्राणायाम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा के साथ हुई, जिससे पूरे शिविर में अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभावना का एक विशेष वातावरण देखने को मिला।
जिला मीडिया सहसंयोजक मोनू सुरेश छीपा ने बताया कि योग प्रशिक्षक अभिसूत्रा सोलंकी ने सभी कार्यकर्ताओं को योग एवं प्राणायाम का अभ्यास करवाया। वहीं शाखा शिक्षक राजकुमार आंचलिया, वेद प्रकाश खटीक और विशाल गुरुजी ने शाखा गतिविधियों का संचालन करते हुए संघ प्रार्थना करवाई।
जिला अध्यक्ष प्रशांत मेवाड़ा के कुशल नेतृत्व में आयोजित इस प्रशिक्षण महाभियान के पहले दिन छह अलग-अलग सत्र आयोजित किए गए थे। इसके बाद शाम को एक शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें जिला पदाधिकारियों, जिला कार्यसमिति सदस्यों सहित विधायकगण और सांसदों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस कार्यक्रम में सांसद दामोदर अग्रवाल एवं पूर्व सांसद सुभाष बहेड़िया की विशेष उपस्थिति रही।
शिविर के दूसरे दिन, प्राणायाम सत्र के पूरा होने के बाद सभी पदाधिकारी जिला अध्यक्ष प्रशांत मेवाड़ा की अगुवाई में स्वस्ति धाम पहुंचे, जहां उन्होंने संतजनों के दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
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भीलवाड़ा जिले के फुलिया कला क्षेत्र से इस वक्त एक बड़ी खबर सामने आ रही है, जहां राशन डीलर की मनमानी और धांधली को लेकर ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। लालाराम रावण के नेतृत्व में ग्रामीणों ने एकजुट होकर राशन डीलर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और इस पूरे घोटाले को उजागर किया है। स्थानीय राशन डीलर रामदेव रेगर के खिलाफ ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर को एक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए गए हैं।
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि यह डीलर लंबे समय से उपभोक्ताओं के हक पर डाका डाल रहा है और फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी राशन सामग्री का अवैध रूप से उठाव कर रहा है। भ्रष्टाचार की हद तो तब पार हो गई जब ग्रामीणों को पता चला कि डीलर द्वारा उन लोगों के नाम से भी राशन उठाया जा रहा है जिनकी मौत हो चुकी है। इसके अलावा एक ही परिवार के सदस्यों के नाम पर अलग-अलग फर्जी राशन कार्ड बनाकर गेहूं उठाने का खेल भी धड़ल्ले से चल रहा है।
शिकायत में यह भी साफ किया गया है कि डीलर कई उपभोक्ताओं के राशन कार्ड नंबरों में हेरफेर कर देता है और उनकी सामग्री खुद डकार जाता है। यही नहीं, सक्षम यानी एपीएल श्रेणी के उपभोक्ताओं को भी फर्जी तरीके से अंत्योदय योजना में शामिल कर लिया गया है, ताकि ज्यादा से ज्यादा राशन का गबन किया जा सके। राशन वितरण प्रणाली में चल रही इस भारी अनियमितता से ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।
अब ग्रामीणों ने प्रशासन से इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच करवाने की मांग की है ताकि दोषी डीलर के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सके। इसके साथ ही ग्रामीणों ने प्रशासन को सीधे शब्दों में चेतावनी दे दी है कि यदि अगले सात दिनों के भीतर इस मामले पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे फुलिया कला के बाहर एक बड़ा धरना प्रदर्शन शुरू कर देंगे और इस आंदोलन से उत्पन्न होने वाली हर स्थिति की जिम्मेदारी पूरी तरह से प्रशासन की होगी। इस मामले की प्रतिलिपि जिला रसद अधिकारी और उपखंड अधिकारी सहित तमाम संबंधित अधिकारियों को भी भेज दी गई है ताकि जल्द से जल्द इस पर संज्ञान लिया जा सके ।
लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का यह एकतरफा राज, उसकी यह मनमानी और उसका यह बढ़ता हुआ घमंड ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं टिक सका क्योंकि जैसे ही सीजेपी ने सोशल मीडिया पर अपनी तानाशाही दिखाने की कोशिश की वैसे ही इस पूरी कहानी में एक ऐसा धमाकेदार, सनसनीखेज और ऐतिहासिक ट्विस्ट आया जिसने पूरे इंटरनेट का पासा ही पलट कर रख दिया। कॉकरोच पार्टी के इस बढ़ते दबदबे को कुचलने के लिए, उसके अहंकार को मिट्टी में मिलाने के लिए और उसे सोशल मीडिया पर उसकी असली औकात याद दिलाने के लिए मार्केट में बिल्कुल फिल्मी विलेन और हीरो की तरह एक साथ एंट्री होती है ऑगी जनता पार्टी यानी ओजेपी की। हमारे बचपन के सबसे मशहूर और लोकप्रिय कार्टून शो ऑगी एंड द कॉकरोचेस का वह पुराना टीवी वाला झगड़ा अब सीधे-सीधे देश की मीम पॉलिटिक्स के अखाड़े में तब्दील हो चुका है और ऑगी जनता पार्टी के मैदान में आते ही इंटरनेट पर एक ऐसा खतरनाक और खूनी डिजिटल युद्ध छिड़ गया जिसकी किसी बड़े राजनीतिक विश्लेषक ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। ऑगी जनता पार्टी ने आते ही सोशल मीडिया पर ऐसा शंखनाद किया कि कॉकरोच जनता पार्टी के खेमे में रातों-रात खलबली मच गई और उनके बड़े-बड़े रणनीतिकारों के पसीने छूटने लगे।
अब आलम यह हो चुका है कि पूरा का पूरा सोशल मीडिया दो कट्टर और बेकाबू गुटों में पूरी तरह से विभाजित हो चुका है जहां एक तरफ कॉकरोच सेना अपनी सत्ता और अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है तो दूसरी तरफ ऑगी सेना अपने भारी-भरकम मीम्स, रील्स और घातक वीडियो के हथियारों के साथ कॉकरोचों को सोशल मीडिया से खदेड़ने के लिए मैदान में पूरे दमखम के साथ डटी हुई है। अगर हम न्यूज़ चैनलों के चश्मे से इस पूरे घमासान का बारीकी से और गहराई से विश्लेषण करें तो यह साफ समझ आता है कि यह सिर्फ कोई हंसी-मजाक या साधारण टाइमपास नहीं है बल्कि यह देश के युवाओं के भीतर छुपी हुई उस मानसिकता को दर्शाता है जो पारंपरिक, थकाऊ और उबाऊ राजनीतिक बहसों से पूरी तरह ऊब चुकी है और अब अपनी बात को कहने के लिए इस तरह की अनोखी मीम पॉलिटिक्स का सहारा ले रही है। टीवी चैनलों के बड़े-बड़े एंकर और रात नौ बजे डिबेट में चिल्लाने वाले प्रवक्ता भी इस बात को देखकर हैरान हैं कि जो युवा देश के गंभीर राजनीतिक मुद्दों पर अक्सर शांत रहते थे वे आज इन दोनों काल्पनिक पार्टियों के समर्थन में दिन-रात एक किए हुए हैं और कमेंट सेक्शन को जंग का मैदान बना चुके हैं।
गुजरात के मोरबी से एक ऐसी दिल दहला देने वाली और इंसानियत को शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है, जिसने रिश्तों की मर्यादा को तार-तार कर दिया है। यहाँ आर्थिक तंगी और गरीबी के दलदल में फंसे एक शख्स ने अपनी ही पत्नी और नाबालिग बेटी का सौदा कर डाला।
पूरी घटना गुजरात के मोरबी इलाके की है। पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, पीड़ित परिवार मूल रूप से सुरेंद्रनगर का रहने वाला है। करीब छह महीने पहले यह परिवार रोजगार और काम की तलाश में मोरबी आया था। यहाँ उन्होंने दो हजार रुपये महीने के किराए पर एक मकान लिया। लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी जब कोई काम नहीं मिला, तो परिवार गंभीर आर्थिक संकट में घिर गया। देखते ही देखते मकान का चार महीने का किराया बकाया हो गया।
जब मकान मालिक ने किराए के पैसों के लिए दबाव बनाना शुरू किया, तो आरोपी पति ने बेहद खौफनाक और शर्मनाक कदम उठाया। महज दो हजार रुपये का किराया न चुका पाने के एवज में उसने मकान मालिक के साथ अपनी पत्नी और मासूम बेटी का सौदा कर लिया। आरोप है कि इसके बाद मकान मालिक पिछले छह महीनों तक लगातार महिला और उसकी नाबालिग बेटी का यौन शोषण और दुष्कर्म करता रहा।
दोनों पीड़िताएं लोक-लाज और बेबसी के कारण लंबे समय तक इस खौफनाक प्रताड़ना को झेलती रहीं। लेकिन जब जुल्म और प्रताड़ना की हद पार हो गई, तो महिला ने हिम्मत जुटाई और सीधे पुलिस थाने पहुंचकर इस पूरी आपबीती की शिकायत दर्ज कराई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस तुरंत एक्शन में आई। पुलिस उपाधीक्षक जेएम लाल ने बताया कि शिकायत मिलते ही कार्रवाई करते हुए नाबालिग पीड़िता के पिता और मुख्य आरोपी मकान मालिक को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस घिनौने अपराध में शामिल एक अन्य आरोपी की तलाश में पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है। पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के तहत मामला दर्ज कर आगे की कानूनी जांच शुरू कर दी है।
रविवार दोपहर बालाजी गोवंश हेल्पलाइन के अध्यक्ष खुशराज वैष्णव को विजयनगर से गौसेवक मनीष का कॉल प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि इटडिया गांव में एक गोवंश पिछले कई दिनों से अस्वस्थ हालत में घूम रहा है। यह सूचना स्थानीय गौसेवक रमन द्वारा दी गई थी।
सूचना मिलते ही अध्यक्ष खुशराज वैष्णव ने तुरंत रमन जी से संपर्क कर गोवंश की लोकेशन प्राप्त की और स्थानीय टीम को मौके पर रवाना किया।
भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच टीम मौके पर पहुंची, लेकिन गोवंश को पकड़ना आसान नहीं था। टीम ने करीब एक घंटे तक कड़ी मशक्कत, दौड़भाग और लगातार प्रयास किए। आखिरकार टीम ने बीमार गोवंश को सुरक्षित रूप से पकड़कर बांधने में सफलता हासिल की।
इसके बाद जिलाध्यक्ष राजेश सैन ने स्थानीय पशुचिकित्सा टीम से संपर्क कर गोवंश का उपचार करवाया। सरपंच महादेव गुर्जर के सहयोग से तुरंत एम्बुलेंस की व्यवस्था कर गोवंश को बेहतर उपचार के लिए गुलाबपुरा स्थित माधव गो उपचार केन्द्र भेजा गया।
इस रेस्क्यू अभियान में स्थानीय टीम लीडर प्रमोद गुर्जर के साथ पारस, हाथीराम और देबी लाल ने अहम भूमिका निभाई।
संस्था ने सूचना देने वाले मनीष भैया, रमन भैया, रविवार होने के बावजूद तुरंत चिकित्सा सेवा उपलब्ध करवाने वाली ऋतु मैडम, एम्बुलेंस सहयोग देने वाले सरपंच महादेव गुर्जर तथा माधव गो उपचार केन्द्र का आभार व्यक्त किया ।
राजस्थान के भीलवाड़ा से एक ऐसी प्रेरणादायक खबर सामने आई है, जो हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का जज्बा जगा सकती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत और ईंधन बचत के आह्वान से प्रेरित होकर भीलवाड़ा के समाजसेवी और भाजपा नेता सत्यनारायण गुग्गड़ ने एक ऐसा संकल्प लिया है, जिसकी आज पूरे इलाके में चर्चा हो रही है।
शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के बावजूद सत्यनारायण गुग्गड़ का हौसला और देशप्रेम किसी भी मजबूत इंसान से कम नहीं है। उन्होंने फैसला किया है कि अब हर महीने वे 4 दिन अपनी ट्राइसाइकिल से ही सफर करेंगे… और पूरे 8 दिन अपनी कार का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करेंगे।
सुनने में यह फैसला छोटा लग सकता है… लेकिन इसके पीछे छिपी सोच बहुत बड़ी है।
सत्यनारायण गुग्गड़ कहते हैं—
"अगर देश का हर नागरिक छोटी-छोटी बचत करना शुरू कर दे… अगर हम ईंधन की खपत कम करें… तो देश पर पेट्रोल और डीजल के आयात का दबाव कम होगा… विदेशी मुद्रा की बचत होगी… और भारत आर्थिक रूप से और मजबूत बनेगा।"
उन्होंने यह भी कहा कि देशसेवा केवल सीमा पर जाकर ही नहीं होती… बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी में लिए गए छोटे-छोटे फैसले भी राष्ट्र निर्माण में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
दिव्यांगता शरीर में हो सकती है… लेकिन अगर मन में देशभक्ति का जज्बा हो… तो इंसान समाज के लिए मिसाल बन जाता है।
आज भीलवाड़ा से उठी यह प्रेरक पहल न सिर्फ राजस्थान… बल्कि पूरे देश के लिए एक संदेश है… कि बदलाव की शुरुआत हमेशा खुद से होती है।
ताज़ा समाचारों के लिए देखते रहिये यक्ष न्यूज और चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूले।
राजस्थान के भीलवाड़ा से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ अवैध संबंधों के शक में एक कसाई बने पति ने अपनी ही गर्भवती पत्नी की बेरहमी से हत्या कर दी। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।
यह खौफनाक मामला भीलवाड़ा के हमीरगढ़ थाना क्षेत्र की बीएसएल कॉलोनी का है। यहाँ उत्तर प्रदेश के हरदोई का निवासी गोपी यादव एक फैक्ट्री में श्रमिक के रूप में काम करता था। गोपी को अपनी गर्भवती पत्नी रोली देवी के चरित्र पर शक था, जिसे लेकर दोनों में अक्सर विवाद होता था।
बीते दिन यह विवाद इतना बढ़ा कि आरोपी ने तैश में आकर पत्नी के साथ जमकर मारपीट शुरू कर दी। क्रूरता की हदें पार होने के कारण महिला का गर्भपात हो गया। अत्यधिक मारपीट और गंभीर चोटों के कारण महिला दर्द से चीखने लगी। चीख-पुकार सुनकर जब पड़ोसी मौके पर पहुंचे, तो वहाँ का खौफनाक मंजर देखकर दंग रह गए।
स्थानीय लोग गंभीर रूप से घायल और लहूलुहान महिला को तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन अत्यधिक खून बह जाने के कारण इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया।
हमीरगढ़ थाना प्रभारी सुनील कुमार बेड़ा के अनुसार, मृतका की बेटी की रिपोर्ट पर मामला दर्ज कर आरोपी पति गोपी यादव को गिरफ्तार कर लिया गया है। एफएसएल की टीम ने मौके से साक्ष्य जुटाए हैं। फिलहाल शव को मोर्चरी में रखवाकर यूपी में रह रहे परिजनों को सूचित कर दिया गया है, जिनके आने पर मेडिकल बोर्ड द्वारा पोस्टमार्टम किया जाएगा।
एक शादी का रिश्ता बना था… सपनों से भरा… परिवारों की रजामंदी थी… शादी की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं… और दो दिल आने वाले कल के सुनहरे सपने देख रहे थे।
लेकिन फिर… एक रात… सब कुछ बदल गया।
एक ऐसी वारदात हुई… जिसने सिर्फ एक लड़की की जिंदगी ही नहीं, बल्कि दो परिवारों की खुशियों को भी पलभर में तोड़ दिया।
लड़की के साथ कुछ दरिंदों ने मिलकर सामूहिक दुष्कर्म किया और भाग छूटे । उस खबर ने पूरे इलाके को हिलाकर रख दिया। लोग तरह तरह की बाते करने लगे घर के अंदर सन्नाटा था… बाहर लोगों की भीड़… और हर जुबान पर सिर्फ एक ही सवाल… अब क्या वह रिश्ता बच पाएगा… या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा?
दिन बीतते गए… चर्चाएं बढ़ती गईं… कोई कह रहा था अब शादी नामुमकिन है… कोई कह रहा था समाज कभी इसे स्वीकार नहीं करेगा।
इसी बीच पुलिस ने तेजी दिखाई… जांच आगे बढ़ी… और फिर एक-एक कर सभी आरोपी सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए। पूरे इलाके में यह खबर आग की तरह फैल गई… लेकिन लोगों के मन में अब भी एक सवाल बाकी था… क्या इंसाफ के बाद भी वह रिश्ता बच पाएगा?
फिर… एक दिन… अचानक गांव की गलियों में कुछ ऐसा हुआ, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
दूर से बैंड-बाजे की आवाज सुनाई दी… बच्चे दौड़ पड़े… लोग घरों से बाहर निकल आए… हर नजर सड़क पर टिक गई… और अगले ही पल जो दृश्य सामने आया… उसने हर किसी की आंखें नम कर दीं।
सामने दूल्हे के वेश में वही मंगेतर खड़ा था… जिसने सबके सामने अपनी होने वाली जीवनसंगिनी का हाथ थामा… और कहा… “वादे हालात देखकर नहीं बदले जाते…”
हकीकत में दूल्हे ने ही अपनी होने वाली दुल्हन के साथ हुए हादसे के बाद उसका साथ छोड़ने के बजाय उसका साथ देकर अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया था ।
इसके बाद फतेहपुर की यह कहानी दर्द से निकलकर साहस, सम्मान और सच्चे प्रेम की मिसाल बन गई।
Ramayan… एक नाम नहीं… एक ऐसा एहसास… जिसने करोड़ों लोगों की धड़कनों को एक समय पर बाँध दिया था।
Ramanand Sagar की बनाई यह प्रस्तुति जब रविवार की सुबह टीवी पर आती… तो मानो पूरा India ठहर जाता था।
गलियाँ शांत हो जातीं… बाजार सूने पड़ जाते… दुकानों के शटर आधे बंद हो जाते… और हर घर में लोग टीवी के सामने हाथ जोड़कर बैठ जाते। यह सिर्फ एक धारावाहिक नहीं था… यह आस्था का उत्सव था।
जैसे ही संगीत बजता… दिलों की धड़कन तेज हो जाती… और स्क्रीन पर Arun Govil दिखाई देते… लोगों को अभिनेता नहीं… स्वयं प्रभु श्रीराम के दर्शन होते। कई घरों में अगरबत्ती जलती… कई लोग स्क्रीन को प्रणाम करते… बच्चों तक को चुप रहने को कहा जाता।
फिर आया वो पल… अयोध्या में उत्सव था… राजतिलक की तैयारी थी… खुशियाँ थीं… लेकिन एक वचन ने सब बदल दिया। श्रीराम ने मुस्कुराते हुए वनवास स्वीकार किया… और उस दिन सिर्फ अयोध्या नहीं रोई थी… पूरा देश रो पड़ा था।
जब Deepika Chikhalia ने सीता बनकर राम के साथ वन जाने का निर्णय लिया… लाखों आँखें नम हो गईं। जब जंगल में संघर्ष शुरू हुआ… जब सीता हरण हुआ… और जब राम की दर्द भरी पुकार गूँजी—"सीते…!"… उस एक आवाज़ ने करोड़ों दिलों को भीतर तक हिला दिया।
फिर आया युद्ध… धर्म और अधर्म का महासंग्राम… हर घर में सन्नाटा था… हर निगाह स्क्रीन पर थी… और जब रावण गिरा… तो लोगों ने सिर्फ एक पात्र को गिरते नहीं देखा… उन्होंने अहंकार को टूटते देखा… अधर्म को मिटते देखा।
आज भी जब Ramayan का नाम लिया जाता है… तो याद आता है वो दौर… जब टीवी चलता नहीं था… पूजा जाता था… और जब टीवी पर शुरू होती थी रामायण … तो सचमुच समय रुक जाता था ।
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